सोमवार, 28 नवंबर 2011

बिज्जी के पास है लोककथा के जादू का बक्सा : शशिकांत

विजयदान देथा (बिज्जी)
राजस्थानी और हिन्दी के बहुचर्चित लेखक विजयदान देथा  
उर्फ़ बिज्जी पचासी वर्ष के हो गए हैं. पिछले दिनों उनका नाम 
नोबेल पुरस्कार के लिए शॉर्टलिस्टेड होने की भी ख़बर आई थी. 
बिज्जी की कहानियाँ जब पहली बार पाठकों के सामने आई तो 
उन्होंने एक हलचल सी मचा दी थी. आधुनिक भारतीय 
साहित्य में लोक तत्व इस तरह से प्रासंगिक होकर पहली बार 
दिखा था. उदय प्रकाश ने सन 2001 में साहित्य अकादेमी के 
लिए बिज्जी पर फ़िल्म बनाई थी. बतौर निर्देशन सहायक मेरी 
वह पहली डाक्यूमेंट्री फ़िल्म थी. उस दौरान बिज्जी के गाँव 
बोरुन्दा में बिज्जी के संग बिताए लम्हे को दैनिक हिंदुस्तान ने (27  नवम्बर 2011) प्रकाशित किया है. पेश है. - शशिकांत 


सन 2001 का मार्च महीना। मौसम गर्म होने लगा था। किराए की एक सूमो कार सुबह-सुबह दिल्ली के ट्रैफिक जाम से निकलकर दिल्ली-जयपुर हाइवे पर फर्राटे से भाग रही थी। उस पर सवार थे हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक और निर्देशक उदय प्रकाश, 'सत्या', 'कौन', 'तरकीब', 'कितने दूर कितने पास', 'मस्ती' के सिनेमाटोग्राफर तथा 'मोहनदास' फिल्म के निर्देशक मजहर कामरान और यूनिट के अन्य साथी। हम सभी राजस्थानी और हिंदी के बहुचर्चित कथाकार विजयदान देथा पर साहित्य अकादेमी के लिए फिल्म शूट करने बिज्जी के गाँव जा रहे थे। जयपुर और अजमेर होते हुए  जोधपुर पहुंचते-पहुंचते रास्ते में ही शाम हो गई। कोई आठ-नौ बजे पूछते-पाछते हम पहुंचे बिज्जी के गाँव बोरून्दा।

बोरुन्दा- करीब पंद्रह-बीस हजार की आबादी. गाँव से छोटे शहर में तब्दील होता एक कस्बा। वहाँ है बस स्टैंड, एक छोटा सा बाज़ार, स्कूल, गर्ल्स टीचर ट्रेनिंग कॉलेज और राजस्थानी लोककला का विशाल म्यूजियम ष्रूपायन संस्थानष्। गाँव की मुख्य सड़क से नई-नई बस रही कालोनीनुमा कच्ची सड़क से होते हुए जैसे ही हमारी गाड़ी बिज्जी के घर के गेट पर पहुंची, परम्परागत लिबास (धोती-कुर्ते) में एक बुजुर्ग घर से निकल आए और पूछा, ''उदय, तुमलोग आ गए?'' 

फिर उनकी कोमल सी आवाज गूंजी, ''कैलाशे....गेट खोलो।'' उसके बाद बिज्जी हमारी पूरी टीम को अपने कमरे में ले गए और परम्परागत राजस्थानी शैली में आरती उतारकर सबसे पहले उदय प्रकाश और फिर पूरी प्रोडक्शन टीम का स्वागत सत्कार किया। फिर शुरू हो गई आज के समय के दो बड़े कथाकारों के बीच बातचीत। बिज्जी ने कहा, ''मैं उदय (प्रकाश) को 'तिरिछ' के लेखक के रूप में जानता हूँ...!''

कोई दस-पंद्रह दिनों तक हमारी शूटिंग चली। अल्लसुबह से देर शाम और कभी-कभी देर रात तक साथ-साथ घुमते। कभी अपने पुराने पुश्तैनी घर में, कभी गाँव की गलियों और चैपालों पर गाँववालों से किस्से कहानियाँ सुनते-दर्ज करते हुए तो कभी बियाबान में भेड़ चराते गड़ेरियों से बोलते-बतियाते हुए कैमरे का सामना करते। 

लोकेशन की तलाश में आसपास के इलाकों में भटकते हुए कच्ची-पक्की सड़क के किनारे जंगलों, खेतों में उछलते-कूदते हिरणों, बारहसिंगों, चीतलों या सतरंगे पंख फैलाए नृत्य करते मोरों के झुण्ड देखकर हम रोमांचित होते। इस तरह देर शाम को जब हम वापस लौटते तो बिज्जी पूरी टीम के खाने-पीने का बंदोबस्त भी करते और हम सबके साथ ही खाना खाते। 

रूपायन संस्थान में हमारे ठहरने की व्यवस्था थी। राजस्थानी लोककला का एक विशाल म्यूजियम है बिज्जी के गाँव बोरुन्दा का रूपायन संस्थान। कई एकड़ में फैला उसका विशाल आहाता। बिज्जी ने कोमल कोठारी के साथ इस संस्थान की स्थापना की थी। कोमल कोठारी-राजस्थान के लोकसंगीत को सहेजने में ऐतिहासिक भूमिका निभानेवाला एक व्यक्तित्व। 

पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित कोमल दा राजस्थान संगीत नाटक अकादेमी से भी जुड़े थे। बिज्जी और कोमल कोठारी के बीच पुरानी दांतकाटी दोस्ती थी। कोमल कोठारी ने बिज्जी के साथ मिलकर सन 1953 में 'प्रेरणा' नामक पत्रिका निकालना शुरू किया। 'प्रेरणा' निकलने का उद्देश्य था हर माह एक नया राजस्थानी लोकगीत खोजकर उसे लिपिबद्ध करना।  

लोक साहित्य को आधुनिक सन्दर्भ में प्रस्तुत करनेवाले इस पचासी वर्षीय लोकचितेरा के साथ खाना खाने के बाद हम अपने-अपने बिस्तर रूपायन संस्थान की छत पर बिछा लेते और बारह-एक बजे तक उनसे बातचीत करते। बतौर फिल्म निर्देशक-सह निर्देशक उदय जी और हमारी दिलचस्पी बिज्जी की जिन्दगी के बीते लम्हों में होती। बिज्जी बिना किसी सेंसर की कैंची चलाए अपनी जिन्दगी के हर दास्तान हमें सुनाते जाते. यहाँ तक कि युवावस्था के अपने विफल प्रेम के बारे में भी, बेहद भावुकता और संजीदगी के साथ। 

बिज्जी बहुत छोटे थे तभी उनके सिर पर से उनके पिताजी का साया उठ गया था. उस भयानक हादसे की याद आज भी बिज्जी को मर्माहत कर देती है, ''तब मैं सिर्फ चार साल का था. पास के एक गाँव में ज़मीन के एक झगड़े में मेरे पिताजी और उनके दो भाई मौत के घाट उतार दिए गए. मेरे पिताजी नहीं जा रहे थे लेकिन मेरी मान ने कहा की नहीं जाएंगे तो ज़िन्दगी भर हमें ताने सुनने पड़ेंगे. तब पिताजी गए और थोड़ी देर बाद उनकी और उनके दोनों भाइयों की क्षत-विक्षत लाश घर आई.'' बिज्जी ने अपने गाँव बोरुन्दा में ही एक पीपलबाड़ी में अपने स्वर्गीय पिताजी की समाधि बना रखी है.

आज किसी को भी यह जानकर ताज़्ज़ुब होना चाहिए कि सन सैंतालिस के बाद देश में बड़ी तेजी से शुरू हुए केंद्रीकृत विकास, शहरीकरण, औद्योगीकरण वगैरह के बीच जब कॉलेज और विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा हासिल कर मध्यवर्गीय आकांक्षाओं को पाले युवावर्ग नौकरी और रोजगार के लिए दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे महानगर या अपने आस-पास के छोटे-बड़े शहर की ओर उन्मुख हो रहा था उस वक्त बिज्जी ने उल्टी गंगा बहाने का फैसला किया था। 

सुनिये बिज्जी क्या कह रहे हैं, ''हर आम युवक की तरह मैं भी कॉलेज में पढ़ने जोधपुर गया। एमए करने के बाद अब क्या करूँ? ये सवाल जब मेरे सामने आया तो मैंने सोचा कि मुझे लिखना है. फिर मैंने फैसला किया कि जब तक विश्वविद्यालय की डिग्री को भूलकर जिन्दगी को देखना-समझना नहीं शुरू करूंगा तब तक अच्छा लेखक नहीं बन पाऊंगा। तब तक मैं हिंदी में कहानियाँ लिखने लगा था...

उस वक्त हिंदी कहानी के क्षेत्र में कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेन्द्र यादव की तिकड़ी स्थापित हो चुकी थी। फिर मुझे लगा कि इन लोगों के बीच हिंदी में लिखूंगा तो मीडियाकर लेखक बनकर रह जाऊंगा। तब कहीं जाकर मैंने फैसला किया कि मैं अपनी मातृभाषा राजस्थानी में लिखूंगा। उसके बाद मैं अपने गाँव बोरून्दा आ गया और राजस्थानी में लिखने लगा।''
   
लेकिन शहर से कॉलेज की पढ़ाई करके गाँव लौटे बिज्जी के लिए राजस्थानी भाषा में लिखना एक बड़ी चुनौती थी, ''बचपन से पढ़ाई के चक्कर में राजस्थान से बाहर था तो राजस्थानी भाषा से कट गया था। फिर मेरे लिखने से पहले राजस्थानी में कोई साहित्य था ही नहीं। मैंने ही राजस्थानी में पहली बार साहित्य लिखना शुरू किया। बड़ी समस्या थी। गाँव आने के बाद सुबह-सुबह तैयार होकर निकल जाता. मैं गाव के लोहार, जुलाहे और मोचियों के घर जाता और उनसे घंटों राजस्थानी में बातें करता, उनसे किस्से-कहानियाँ सुनता। 

इतना ही नहीं, मैंने घर में औरतों से बात की। किसी भी समाज में औरतों की भाषा सबसे शुद्ध होती है। इस तरह राजस्थान की कई लोककथाओं से मेरा परिचय हुआ। फिर मेरे मन में आया कि कि श्रुति परम्परा में चली आ रही इन लोककथाओं को क्यों न संरक्षित करूँ। उसके बाद में कॉपी-कलम लेकर जाने लगा. जो किस्से-कहानियाँ सुनता उन्हें कागज पर दर्ज कर लेता और घर पर आकर कहानी की शक्ल में तैयार कर लेता। धीरे-धीरे मैं इन लोक में प्रचलित कहानियों को आधुनिक सन्दर्भ में पेश करने लगा। इस तरह राजस्थानी भाषा की अपनी शब्द संपदा को बढ़ाने का प्रयास करता रहा।''

राजस्थानी और हिंदी कथा साहित्य में बिज्जी का ऐतिहासिक योगदान यह है कि उन्होंने श्रुति परम्परा में चली आ रही राजस्थान की लोककथाओं को न केवल दर्ज किया बल्कि उन्हें आधुनिक सन्दर्भ में प्रस्तुत किया। ''श्रुति परम्परा में चली आ रही सदियों पुरानी लोककथाओं के पुनर्लेखन और आधुनिक संदर्भ में उनकी प्रस्तुति की क्या कठिनाइयां है?'' 

इस सवाल पर बिज्जी ने कहा, ''लोककथाओं को शब्दों में पिरोना अपने आपमें एक कठिन काम था। मैं वह करता रहा। कई लोग मेरी इस शैली की आलोचना करते हैं लेकिन मेरा कहना है कि अगर मैं मौलिक कहानियाँ लिखता तो चालीस-पचास कहानियों के बाद उनमें भी दोहराव या एकरूपता आ ही जाती। सभी कहानियों में बार-बार वही-वही कथानक घूमता रहता। एक कहानी पढ़ो चाहे पचास कहानी पढ़ो, वही एकरूपता दिखती रहती। हमारे राजस्थानी में हजारों, लाखों लोककथाएं हैं। इसलिए मैंने लोककथाओं को आधुनिक रूप में लिखने का फैसला किया।''
  
''खोजे खोजे खोजेगा तो तीन लोक को पायेगा, पाए पाए पायेगा तो कित्ता गडेरा खाएगा।'' कबीर के एक दोहे को अपने लेखन का दर्शन बताते हुए बिज्जी कहते हैं, ''बचपन में जब शरतचंद्र को पढ़ता था तो पानी के बर्तन लेकर बैठता था। पढ़ता था और आंख से आंसू निकलते रहते थे. फिर पानी से आँख धोता था और पढ़ता था। शरतचंद्र, रवीन्द्रनाथ टैगोर, चेखव, तालस्ताय, गोर्की, रसूल हमजातो- इन सबको पढ़ता। लेकिन मैं सिर्फ इनके लिखे शब्दों के पीछे नहीं भागता बल्कि इनके शब्दों को लिखने की कला की खोज करता।''

दरअसल रचना प्रक्रिया किसी भी लेखक का निजी रचना लोक होता है। इस लोक में गोते लगाकर आप अपने लेखक को और उनकी रचनाओं को समझते हैं। अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बिज्जी बताते हैं, ''लिखना मेरे लिए तो यह साँस लेने और जीने की तरह से सहज है। मैं तो एक निमित्त मात्र था। कलम उठाई और लिखने बैठ गया, बिना कुछ सोचे और बिना कोई योजना बनाई। न मैं काट-छाँट करता हूँ न अपने लिखे हुए को दोबारा पढ़ता हूँ। कहानी अपने आप बनती चली गई। जैसे कोई अदृश्य शक्ति लिखाती रहती है।''

राजस्थानी और हिंदी के सर्वोच्च लेखकों में से गिने जानेवाले बिज्जी ने राजस्थानी लोक गीतों के छः संकलन, राजस्थानी लोककथाओं पर आधारित 'बातां री फुलवारी' के तेरह संकलन और राजस्थानी कहावतों के आठ संकलन संपादित किये हैं। बिज्जी की प्रमुख कृतियों में 'दुविधा', 'सपनप्रिया', 'महामिलन', 'तीडो राव', 'उलझन', 'अलेखूं हिटलर' प्रमुख हैं। उन्होंने 'राजस्थानी हिंदी कहावत कोश' का भी संपादन किया है। 

बिज्जी  की लिखी कई कहानियों पर बॉलीवुड के सुप्रसिद्ध निर्देशक फिल्में बना चुके हैं। इनमें प्रमुख हैं- मणि कौल की 'दुविधा', प्रकाश झा की 'परिणति', अमोल पालेकर की 'पहेली' और श्याम बेनेगल की 'चरणदास चोर'। इसके अलावा सुप्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर निर्देशित बहुचर्चित नाटक 'चरणदास चोर' बिज्जी की लोककथा 'फितरती चोर' पर ही आधारित है।

पिछले एक सितम्बर को बिज्जी पचासी साल के हो गए। बिज्जी आज राजस्थान या भारत ही नहीं बल्कि विश्व साहित्य के नामचीन लेखकों में शुमार हो गए हैं। इस साल साहित्य के क्षेत्र में मिलने वाले नोबेल पुरसकार के लिए देश के दो लेखक दौड़ में थे। विजयदान देथा उनमें एक थे और दूसरे थे के सच्चिदानंदन। पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित बिज्जी को आज राजस्थान का शेक्सपीयर कहा जाता है। 

सन 2007 में एक हादसे के बाद बिज्जी ने लिखना बंद कर दिया है। वे कहते हैं, ''जब भी लिखने बैठता हूं तो तनाव होने लगता है। हम चारणों के वंशज हैं। हमारे पूर्वज राजाओं के लिए गाते थे। इसलिए कहानी हमारे खून में है।''

बुधवार, 26 अक्तूबर 2011

हमारे अनुरूप ही है त्योहार का यह दिखावा : पवन के वर्मा


पवन के वर्मा

भारतीय विदेश सेवा के वरिष्ठ अधिकारी  पवन के वर्मा भारतीय मध्यवर्ग के विशेषज्ञ हैं. 'द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास' उनकी बहुचर्चित किताब है. पवन जी इन दिनों भूटान में भारत के राजदूत हैं. पवन जी का मानना है कि दीपावली को तड़क-भड़क का पर्व मध्य वर्ग ने बनाया है, बाज़ार ने तो बस इसमें सहयोग दिया है. आज 26 अक्टूबर 2011 को दीपावली के अवसर पर दैनिक हिंदुस्तान में पढ़िए पवन के वर्मा के साथ शशिकांत की बातचीत पर आधारित यह लेख. - शशिकांत 


हमारे अनुरूप ही है त्योहार का यह दिखावा

  • पवन के वर्मा

(लेखक भूटान में भारत के राजदूत हैं)

आज हमारे देश में दीपावली समृद्धि, सम्पन्नता और दिखावे का त्योहार बन गयी है। होली, दीपावली, दशहरा आदि पर्व-त्योहार प्राचीन काल से ही हमारे यहाँ बड़े धार्मिक-सांस्कृतिक उत्सव के रूप में मनाए जाते रहे हैं। चूंकि आज कुछ लोगों के पास ज्यादा पैसे आ गए हैं इसलिए इस तरह के धार्मिक-सांस्कृतिक उत्सवों या कहें पर्व-त्योहारों में पैसे के साथ-साथ दिखावा ज्यादा होने लगा है। त्योहारों के अवसर पर कुछ लोगों में होड़ रहती है कि इस प्रदर्शन में कौन अव्वल रहता है। सन 1991 के बाद एक ख़ास तबके में यह बदलाव ख़ासतौर से आया है। 

दरअसल दिखावे कि इस पृवृत्ति पर उंगली उठाने से पहले हम यह भूल जाते हैं कि नैतिकता अपनी जगह है और हमारा व्यवहार अपनी जगह। दरअसल हमारे देश में संवेदनशीलता का अभाव है। हम सिर्फ त्योहारों को ही क्यों देखते हैं। हमारे देश के विशाल मध्यवर्ग में जिस पैमाने पर शादियों और पार्टियों में ख़र्च बढ़ रहे हैं वह क्या है? देश के महानगरों और शहरों में बाजारों की चकाचौंध को देख कर लगता ही नहीं कि देश में इतनी बड़ी संख्या में ग़रीब लोग हैं।

सच पूछा जाए तो इस तरह के गैर जिम्मेदाराना व्यवहारों के बीज हमारी परम्परा में ही रहे हैं. हाँ इंडिविजुअलिस्टिक लोग हैं जो मानते हैं कि हर इंसान का अपना कर्म है और उसी के हिसाब से वह जीवन भुगतेगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस सन्दर्भ में हमें भारतीय परम्परा की भी जांच-पड़ताल करनी पड़ेगी। पीछे मुड़कर देखें तो पहले भी हमारे देश के लोगों का सामाजिक व्यवहार कोई आइडिअल नहीं था। हमारे यहाँ की वर्णाश्रम व्यवस्था इसकी मिसाल है।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि हमारे यहाँ चार आश्रम थे। गृहस्थाश्रम के बारे में हिन्दू शास्त्रों में कहा गया है कि इस अवस्था में धन बटोरना चाहिए। यानि धन बटोरना हमारी परंपरा में है। दूसरे शब्दों में कहें तो हमारे हिन्दू धर्म में धन संग्रह और एश्वर्य से को वैधता प्रदान की गई है। फिर हमारे देश के परम्परागत लोगों को इससे इनकार क्यों होना चाहिए? विडंबना की बात यह है कि हमारे धर्मशास्त्रों में यह नहीं कहा गया है कि इस तरह के धन संग्रह और एश्वर्य से समाज के भीतर किस तरह की दिक्कतें पैदा होंगी।

हमारे सबसे लोकप्रिय हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ रामायण में सबसे बदतर आदमी की तुलना ग़रीब आदमी से की गयी है। कौटिल्य ने कहा है कि राजा को आर्थिक दृष्टि से समृद्ध होना चाहिए। दक्षिण भारतीय रामायण में भी इसका जिक्र है। हालांकि हमारे भारतीय संस्कृति में बहुत सारी ऐसी बातें हैं जो एक दूसरे के विपरीत हैं लेकिन मैं नहीं मानता कि हमारे देश में समाजवाद की कोई परम्परा रही है। बल्कि कटु सत्य यह है कि हमारा भारतीय समाज जातियों में बंटा रहा है। आज इक्कीसवीं सदी में हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती इस परम्परागत जातीय बंटवारे को बदलने की है। दरअसल आज न कल हमें इस जाति व्यवस्था को बदलना ही होगा। 

जहां तक हमारे देश में उत्सवधर्मिता का सवाल है जिस चीज में भारत के विशाल मध्यवर्ग की दिलचस्पी होगी उसकी पूर्ति के लिए उसके आसपास बाज़ार उपलब्ध होगा। बाज़ार मुनाफे पर चलता है। मुनाफ़ा कमाने के लिए बाजार में सक्रिय ताकतें सभी तरह के कर्म करेंगी। आज हमारे देश के विशाल मध्यवर्ग के पास पैसा है। वह पैसे ख़र्च कर सकता है। इसके लिए उसे अवसर चाहिए. हमारे परमपरागत पर्व-त्योहार, शादी-विवाह आदि उसे यह अवसर प्रदान करते हैं। 

दरअसल हाल के वर्षों में हमारे देश में जनसंचार के क्षेत्र में जो क्रांति हुई है उससे यहाँ के विशाल मध्यवर्ग की स्पेंडिंग कंडीशन पर व्यापक असर पड़ा है। मीडिया और जनसंचार के विभिन्न माध्यमों और बाज़ार ने दीपावली एवं दूसरे पर्व-त्योहारों को मनाने के लिए हमारे यहाँ के विशाल मध्यवर्गीय लोगों को तरह-तरह के ऑब्जेक्टिव ऑफ़ डिजायर दिए हैं। इसलिए हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बाज़ार का मूल धर्म है पैसे बनाना और और अपनी जगह वह सही भी है। लेकिन निश्चित रूप से बाज़ार के पैरोकारों ने यह माहौल बनाया है कि आर्थिक समृद्धि ही सब कुछ है, बाक़ी सब बेकार है।

मुझे लगता है कि सन 1990 के बाद हमारे देशके लोगों की जीवनशैली में बुनियादी परिवर्तन आया है और हमारी मान्यताएं भी बदली हैं। यह वही समय था जब हमारे देश में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई थी। उसी के साथ-साथ देश में सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति और टेलीविजन क्रांति भी हुई। उसके बाद हमारे यहाँ टेलीविजन, कम्प्यूटर, इंटरनेट, मोबाइल फ़ोन, बड़ी तीजी से इस्तेमाल बढ़ा है। इन सबके कारण न केवल हमारे देश के लोगों के जीवनशैली बदली है बल्कि इसने हमारे लगभग पूरे समाज के सोच को ही बदल कर रख दिया है। 

हमारे यहाँ आज महानगर और बड़े-छोटे शहर ही नहीं बल्कि अब तो गाँव-देहात तक में अलग-अलग कंपनियों के करोड़ों टेलीविजन सेट्स हैं जिन्हें करोड़ों लोग रोज देख रहे हैं। हाल के वर्षों में हमारे देश के भीतर कम्प्यूटर, इंटरनेट और मोबाइल फ़ोन का भी बड़ी तेजी से इस्तेमाल बढ़ा है। कई देसी और विदेशी मल्टीनेशनल कंपनियों ने इस धंधे में निवेश किया है। टेलीविजन, कम्प्यूटर, इंटरनेट, मोबाइल फ़ोन आदि आज बाज़ार और उपभोक्ता सामग्रियों के विज्ञापन का बहुत बड़ा जरिया बन गए हैं। हमारे देश के आम लोगों के व्यावहारिक जीवन में बाज़ार की दख़ल लगातार बढ़ती जा रही है।

यहाँ हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सन 1991 के पहले हमारे बाज़ार में गिने-चुने प्रोडक्ट्स होते थे जो अब बेहिसाब संख्या में आ गए हैं। आपका पड़ोसी अगर यह सब खरीद रहा है और आप ऐसा नहीं करना चाहते हैं तो आपके बच्चे आपको इसे खरीदने के लिए विवश कर दे रहे हैं। आज हमारे जीवन प्रणाली हमारे एसेंशियल कैरेक्टर से मिलती हैं। इसीलिए मैं जोर देकर कहना चाहूंगा कि समाजवाद के जमाने में जो हो रहा था वह मात्र दिखावा था। और आजकल हमारे आसपास जो कुछ हो रहा है वह रीयल सायकी है. इसलिए इस दौर को हमें ऐतिहासिक दृष्टि से समझने की कोशिश करनी चाहिए । 

इसाई धर्म में कहा गया है कि सुई के छेद से ऊँट निकाला सकता है लेकिन धनी आदमी स्वर्ग नहीं जा सकता। हमारे हिन्दू धर्म में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की बात की गयी है। इसीलिए हमारे यहाँ मान्यता है कि हर हिन्दू के घर में लक्ष्मी है और उनकी पूजा होती है। जिसके घर में लक्ष्मी आती हैं उसकी सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं। इसीलिए आज के बाजारवादी दौर में भौतिक समृद्धि को महत्व दिए जाने को देखकर हमें हैरानी क्यों हो रही है? इसमें कोई दो राय नहीं कि 1991 इस मामले में एक वाटर शेड था, उससे पहले लोगों में गिल्ट होता था कि वे पैसे कमा रहे हैं. वह अपराध-बोध आज के समय में ख़त्म हो गया है।

(शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित)


असली दिखावे की समृद्धि : कुर्रतुल ऐन हैदर



 कुर्रतुल ऐन हैदर
उर्दू की विख्यात लेखिका कुर्रतुल ऐन हैदर एक अमीर और अभिजात परिवार में पैदा हुई थीं, लेकिन उन्हें पैसे के दिखावे से वितृष्णा थी और ग़रीब लोगों के प्रति उनमें गहरी संवेदनशीलता थी. लगभग दस बरस पहले (मजहर कामरान के साथ साहित्य अकादेमी के लिए फ़िल्म बनाने के दौरान) हुई बातचीत में उन्होंने अमीरी के बदलते अर्थों पर बात की थी जो आज भी प्रासंगिक है. पेश है, बीते 23 अक्टूबर 2011 को दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित लेख. - शशिकांत :

''आज की हमारी सोसायटी एक कंज्यूमरिस्ट सोसायटी है। हमलोग कंज्यूमरिज्म की ओर जा रहे हैं। बाजार जाकर देखिये कि कितनी दुकानें खुल गयी हैं और उनमें क्या-क्या बिक रहा है। किस-किस तरह के गुडस भरे पड़े हैं। पर्व-त्योहारों, सादियों, पार्टियों वगैरह में लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं। आजकल के लोगों कों दौलत को प्रदर्शित करने में शर्म  नहीं आती। इसमें गरीब और लोअर मिडिल क्लास के लोग पिसते हैं और गलत रास्ते अख्तियार करते हैं।'' 'आग का दरिया', 'अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो' सरीखी कालजयी कृतियों की लेखिका कुर्रतुल ऐन हैदर उर्फ ऐनी आपा ने आज से कोई दसेक साल पहले बड़ी कोफ्त के साथ यह बात कही थी। उनका गुस्सा जायज था इसलिए भी क्योंकि वह ख़ुद एक रईस ख़ानदान से ताल्लुक़ रखती थीं. 

दरअसल फिजूलखर्ची और दौलत का भौंडा प्रदर्शन ऐनी आपा को नापसंद था। इस तरह की हरक़त को वह 'बेवकूफ़ाना हरक़त' कहती थीं। उनकी इस सोच की वजह थी सामाजिक सरोकारों के प्रति उनका ख़ास रिश्ता। अपने साक्षात्कारों में ग्लोबलाइजेशन के दौर में मुल्क के अंदर पैदा हुए नवदौलतियों की भर्त्सना करते हुए वह इनकी तुलना मुल्क के कुछ पुराने ख़ानदानी रईसों से करती थीं जो दौलतमंद होने के बावजूद सादगी से रहना पसंद करते थे और दौलत का भौंडा प्रदर्शन करने से परहेज करते थे। हालांकि अदब की दुनिया में अपने कददावर पर्सनेलिटी के लिए मशहूर ताउम्र अविवाहित रहनेवाली अपने तमाने की बेहद खूबसूरत इस लेखिका को दौलत और लेखन विरासत में मिली थी। 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बिजनौर के करीब नेहटौर कस्बे में एक जमींदार खानदान में हुई थी ऐनी आपा की पैदाइश। उनकी आलीसान हवेली आज भी वहां महफूज है। इसके अलावा डालनवाला में भी उनका एक बड़ा बंगला था। बकौल ऐनी आपा, 'हमारी मदर नज़र सज्जाद हैदर और फादर सैयद सज्जाद हैदर यलदरम- दोनों रायटिंग करते थे। फादर पीसीएस में कलक्टर ग्रेड में थे। अंडमान में रेवेन्यू कमिश्नर के रूप में उन्होंने कई साल तक काम किया। बाद में उनका ट्रांसफर लखनउ हो गया था। उस वक्त उनके पास अमेरिका की ऑकलैंड कार थी। उन दिनों गिने-चुने लोगों के पास मोटरकार होती थी। एक कार थी 'हिलमैन'। 'स्कोडा' चेकोस्लोवाकिया की कार थी। बाहर से ही आती थी, हिंदुस्तान में कहां बनती थी। अजी, उस जमाने की बात छोड़िये, वो जमाना दूसरा था। नुमाइश नहीं करते थे उस जमाने के लोग। उस जमाने में था कि अपनी अमीरी की अकड़ मत दिखाइये। इसे छिछोरापन समझा जाता था।'

महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर आज भी लोग परेसान हैं लेकिन इक्कीसवीं सदी के शुरुआती सालों में इन्हीं मसलों पर उर्दू की इस बहुचर्चित लेखिका की परेशानी भी काबिलेगौर है। हिन्दुस्तान की आज़ादी या कहें कि पार्टीशन के आसपास अपनी स्टूडेंट लाइफ के वक्त को याद करते हुए ऐनी आपा ने कहा, 'महंगाई और करप्शन के बारे में तो मत पूछिये। लखनउ में उन दिनों हॉस्टल और यूनिवर्सिटी की मेरी पूरी फीस चालीस रुपये मासिक हुआ करती थी। आज कंज्यूमरिज्म इतना बढ़ गया है कि...! यह सब वर्ल्ड ट्रेड का मामला है। मार्केट में तरह-तरह के प्रॉडक्ट आ गए हैं। उसकी मैन्युफैक्चरिंग बढ़ गयी है। इंडस्ट्रियलाइजेशन बढ़ गया है। भ्रष्टाचार की वजह भी है- पैसा। हर किसी का सटैंडर ऑफ लिविंग बढ़ गया है। पहले यह नहीं था। आज जिसके पास एक कोठी, एक कार है वो चाह रहा है कि दो हों। यह सब देखादेखी में हो रहा है। मैं आपको बताउं कि जिस तरह का दिखावा आजकल है, यह पहले नहीं था। पता नहीं आज के लोगों को क्या हो गया है।'
राजनीति और भ्रष्टाचार निःसंदेह रूप से आज एक-दूसरे के पर्याय माने जा रहे हैं। आज के राजनीतिज्ञों के नाम रोजमर्रा तौर पर भ्रष्टाचार के मामले में सामने आ रहे हैं। ऐनी आपा ने इन करप्शन की इन घटनाओं पर अफसोस जाहिर करते हुए अपने जमाने की एक ऐसी मिसाल पेश की जिसे सुनकर आज कोई भी अचंभित हो सकता है। उन्होंने कहा, 'मेंरी एक दोस्त थीं अनीस किदवई। इंदिरा गांधी की कोठी के बगल में उनकी कोठी थी। एक दिन अनीस इंदिरा जी के यहां गयीं। उनके यहां एक शॉल बेचनेवाला आया हुआ था। अस्सी रुपये की एक शॉल उनहें पसंद आयी। इंदिरा जी बहुत देर तक उस शॉल को उलट-पलट कर देखती रहीं। लेकिन आखिरकार उन्होंने महज अठारह रुपये की एक शॉल खरीदा, क्योंकि गलत नहीं थीं वो। ईमानदार औरत थीं। आजकल के लीडरध्मिनिस्टर तो अठारह रुपये की शॉल खरीदते हैं।'

ग्लोबलाइजेशन के दौर में शुरू हुए तथाकिथत विकास को ऐनी आपा  असंतुलित विकास मानती थीं। उन्हें सुनिये उनकी ही जुबानी, 'जिसे आज डेवलपमेंट कहा जा रहा है वास्तव में वह बड़ा अनबैलेंस्ड डेवलपमेंट है। आज के इस माहौल में लोगों में पैसे कमाने की शॉर्टकट प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। आज हमारे यहां स्टैंडर ऑफ लिविंग कितनी बढ़ गयी है। टेलिविजन पर विज्ञापनों में एक से एक प्रोडक्टस को बेचा जा रहा है। गरीब आदमी के पास न तो टेलिविजन है और न उस पर दिखायी जानेवाली लड़की। फिर चोरी, डकैती, अपहरण, बलात्कार, दहेज, हत्या वगैरह घटनाएं बढ़ रही हैं। जब आप लड़कियों को बाजार में खड़ी करके बेच रहे हैं तो फिर अपने आपको सिविलाइज्ड कैसे कहते हैं।'

ऐनी आपा को नयी पीढ़ी की दौलतपरस्ती से शिकायत थी, 'सबसे हैरानी की बात है कि आज पढ़ने-लिखने का किसी को शौक नहीं रह गया है। इस वक्त के लड़के कहते हैं कि ऐसा कौन सा ऐसा बिजनेस शुरू करूं कि जिसमें जल्दी से जल्दी ज्यादा से ज्यादा पैसे कमा लूं यह आज के वक्त का जेनरल टेड है- दे वांट क्विक मनी। आज के यूथ में इस तरह की अनबैलेंस्ड थिंकिंग आ गयी है। हमारे रहन-सहन और सोच-विचार सभी पर इस अनबैलेंस्ड इकॉनमी का प्रभाव पड़ा है। इस पर आप कितनी कहानियां, कविताएं या नॉवेल लिख लें, लोग भले पढ़ लेंगे लेकिन पढ़कर रख देंगे एक ओर। लिखने-पढ़ने को कोई प्रभाव नहीं पड़ता उन पर। इसलिए कहती हूं कि लिटरेचर का अब कोई प्रभाव नहीं रह गया है।'

ऐनी आपा उत्तर प्रदेश के अपने गांव नेहटौर से निकलकर लखनउ, अलीगढ़, देहरादून, कराची, लाहौर, लंदन, मंबई, दिल्ली और नोएडा में रहीं। पार्टीसन के बाद उन्हें भाई के साथ पाकिस्तान शिफ्ट होना पड़ा। वो पाकिस्तान तो शिफ्ट कर गयीं लंेकिन उन्होंने पार्टीशन को कभी कुबूल नहीं किया। हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी संस्कृति को आधार बनाकर वह महज तीस साल की उम्र में 'आग का दरिया' जैसा नॉवेल लिखकर उर्दू अदब की दुनिया में धमाकेदार तरीके से दाखिल हुईं। लेकिन पाकिस्तान के कटटरपंथियों को यह कबूल नहीं था। कहते हैं कि तंग आकर उन्होंने ख्वाजा अहमद अब्बास की मदद से पहले बीबीसी लंदन में नौकरी कीं और फिर मौलाना अबूल कलाम आजाद और पंडित नेहरू की मदद से वापस मुंबई हिंदुस्तान सिफ्ट हो गयीं। 

मुंबई में 'इम्प्रिंट' पांच साल व 'इलस्ट्रेटेड वीकली' छह साल का सम्पादन और एस मुखर्जी की फिल्म 'एक मुसाफिर एक हसीना' की पटकथा एवं संवाद लिखनेवाली ऐनी आपा दरअसल एक यायावर लेखिका थीं। लेकिन उम्र के आखिरी पड़ाव पर वह 'आग का दरिया' पर किसी तरह की बातचीत करना पसंद नहीं करती थीं। दरअसल उनके इस इस नॉवेल पर इतनी बातें हुई कि वो उब चुकी हैं। सुनिये उन्होंने क्या कहा, 'आग का दरिया' को अब छोडिये! उसके बाद मैंने 'अगले जनम मोहे बिटिया न कीजौ', 'चांदनी बेगम', 'आखिरी सब के हमसफर', 'पतझड़ की आवाज' वगैरह लिखा है। इन पर कोई बात क्यों नहीं करता। लोगों की भी भेंड़चाल होती है। एक ही ढर्रे पर चलते हैं। 'अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो' के बारे में उन्होंने बताया, लखनउ में वर्किंग क्लास की औरतों लेकर मैंने यह लंबी कहानी लिख दी थी जिन्हें एक्सप्लॉयट किया जाता है।'

ऐनी आपा शायरों, फनकारों और लिटरेचर को सम्मान दिलाना चाहती थीं। दिन-ब-दिन लिटरेचर के घटते महत्व को लेकर ऐनी आपा की चिंता समझी जा सकती है, 'मेंरा मानना है कि इस वक्त लिटरेचर की कोई अहमियत नहीं रह गयी है। आज के वक्त में जिसके पास पॉलिटिकल पावर है वही ताकतवर है, वही सबकुछ है- लेखक और कलाकार सेकेंड्री हो गये हैं। अच्छी-अच्छी किताबों से भरी लाइब्रेरी हें, आर्ट गैलरी हैं- एक बम फूटा कि सबकुछ तबाह हो गया। यह कितनी बड़ी ट्रेजेडी है। सबसे कोफ्त की बात यह है कि पॉलिटिकल पावर आज कुछ अनपढ़ लोगों के हाथ में है। नेहरू जी और मौलाना आजाद के वक्त शायरों, फनकारों और साहित्यकारों का सम्मान था, वह आज खत्म हो गया है। मैं समझती हूं कि इस वक्त हिदुस्तान ही नही बल्कि पूरी दुनिया में रायटर्स-आर्टिस्ट की कोई आवाज नहीं रह गयी है। अच्छी से अच्छी चीजें लिखी जा रही हैं। लोग उन्हें पढ़ते भी हैं लेकिन पढ़कर साइड कर देते हैं। बावजूद इसके मैं लिटरेचर के बारे में होपफुल हूं कि कोई ऐसा समय आएगा जब लोग इसके महत्व को समझेंगे।'

इतना ही नहीं, हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब को लेकर ऐनी आपा आखिरी दम तक काफी संजीदा थीं, 'देखिये, हमारे हिंदुस्तान का कल्चर काफी रिच रहा है। यहां दिवाली, दशहरा, रामलीला, ईद, मुहर्रम, क्रिसमस आदि पर्व-त्योहारों ने एक ऐसा गंगा-जमुनी कल्चर बनाया जिसका असर हमारे घर-परिवार, समाज और हमारे रहन-सहन, बोलचाल, आचार-विचार-व्यवहार, वेशभूषा आदि पर भी पड़ा। हमें याद है, हमारे यहां की औरतें घर में आपसी बातचीत में एक से एक मुहावरे इसतेमाल करती थीं। मुसलिम औरतें भी रामायण के मुहावरे बोलती थीं मसलन फलां औरत कैकेयी है। हिंदू और अन्य धर्मों के लोग ईद और मुहर्रम में तहेदिल से शरीक होते थे। मलिक मुहम्मद जायसी ने हिंदुओं को केद्र में रखकर 'पदमावत' जैसा महाकाव्य लिखा। ग़ालिब और मीर जैसे शायर इसी जमीन पर पैदा हुए। मुगल काल को आप देखिये! हमारे हिंदुस्तान के बादशाह संगीत, कला और साहित्य से खास ताल्लुक रखते थे। बहुत कम लोग यह जानते हैं कि नवाब वाजिद अली शाह, शाह आलम और बहादुर शाह ज़फर बहुत बड़े फनकार भी थे। दुनिया में ऐसे बहुत कम मुल्क हैं जिनके बादशाह म्यूजिशियन, आर्टिस्ट, परफॉर्मर और रायटर रहे हैं। लेकिन धीरे-धीरे यह सब खत्म होता जा रहा है। आजकल के लीडर्स को इन सब चीजों से कोई लेना-देना नहीं। मुल्क के दीगर हिस्सों में जब-तब दंगे-फ़साद के बारे में सुनती हूं तो बड़ी मायूसी होती है। मुझे याद है जब मैं मुबई में रहती थी तो एक ही बिल्डिंग में अलग-अलग फ्लोर पर अलग-अलग कम्युनिटी के लोग रहते थे और मिलजुल कर रहते थे। मेरा मानना है कि अपनी आइडेंटिटी को लेकर हाल के वर्षों में लोग कॉशस हुए हैं। इसी वजह से क्लेश होने लगे हैं।'

ऐनी आपा एक लेखिका और पत्रकार तो थी ही फिल्म, चित्रकला, संगीत आदि में उनकी खूब दिलचस्पी थी। उन्होंने क्लासिकल म्युजिक का विधिवत प्रशिक्षण लिया था। पाकिस्तान और मुंबई में उन्होंने कई डॉक्यूमेंट्री  फिल्में बनाईं। चित्रकारी में तो उन्हें बचपन से ही लगाव था। अपनी कई किताबों की स्केचिंग उन्होंने खुद कीं। नोएडा के सैक्टर - 21 में जलवायु विहार के अपने घर के ड्राइंग रूम में टंगा अपने हाथों से बनाया मां का चित्र उनकी चित्रकारी का उत्कृष्ट नमूना था। लेकिन बहुमुखी प्रतिभा की धनी अपने जमाने की यह बेहद खूबसूरत लेखिका खुद को रायटर ही मानती थीं, ष्ष्रायटिंग ज्यादा अच्छी लगी। लेकिन मैंने कभी कम्प्रोमाइज नहीं किया। इसकी वजह से काफी नुकसान हुआ। जब आप कम्प्रोमाइज नहीं करेंगे तो आपको बहुत तरह के नुकसान होंगे।'

ताउम्र अविवाहित रहने के ऐनी आपा के फैसले की वजह भी शायद उनका कम्प्रोमाइज न करना ही था। हालांकि अदब की दुनिया में ऐनी आपा के अविवाहित रहने के कई किस्से हैं। बताते हैं कि ख्वाजा अहमद अब्बास और खुशवंत सिंह के साथ उनके करीबी रिश्ते थे। पदमा सचदेव ने अपने एक संस्मरण में लिखा है कि ख्वाजा अहमद अब्बास के साथ उनका निकाह लगभग तय हो चुका था। एक अखबारवाले के द्वारा ख्वाजा की रायटिंग के बारे में पूछे सवाल पर इन्होंने उनको 'बेहूदा किस्म का लेखक' कह दिया इसलिए बात बिगड़ गयी। हालांकि मुझसे बातचीत के दौरान ऐनी आपा ने इससे साफ इनकार किया, 'मैंने कभी उनको ;ख्वाजा अहमद अब्बास को 'बेहूदा किस्म का लेखक' नहीं कहा।'

आज ऐनी आपा हमारे बीच भले नहीं हैं लेकिन उनकी कालजयी कृतियां, उनकी बहुमुखी प्रतिभा और उनका कददावर व्यक्तित्व अदब की दुनिया के बाशिंदों लिए ही नहीं पूरी मानवता के लिए एक धरोहर है। उनसे जुड़े ये संस्मरण वाकई आज हमारे लिए बेहद अहमियत रखते हैं। 

(शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित)

गुरुवार, 6 अक्तूबर 2011

gr8 indian techy boy...!

This is gr8 indian techy boy...ye kal US par kabza kar sakta hai...ab chet jaao beta obama...!


 gr8 indian techy boy

शनिवार, 1 अक्तूबर 2011

शक्ति-पूजा और भारतीय स्त्री: उदय प्रकाश/अनामिका

मित्रो, भारत में शक्ति-पूजा की परम्परा और भारतीय समाज में स्त्री की दशा के सन्दर्भ में उदय प्रकाश और अनामिका से बातचीत पर आधारित यह लेख पिछले साल दुर्गापूजा के अवसर पर राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित हुआ था. आजकल नवरात्र चल रहा है इसलिए यह लेख प्रासंगिक है. पढ़ सकते हैं. शुक्रिया. - शशिकांत  

समाज की मुक्ति से जुड़ी है स्त्री की मुक्ति : उदय प्रकाश
उदय प्रकाश
मेरा मानना है कि यथार्थ को झुठलाने के लिए सबसे ज्यादा धर्म और आध्यात्म का इस्तेमाल किया जाता है, मामला चाहे स्त्री का हो या दलित का या हाशिए पर की अन्य अस्मिताओं का। हमारे यहां कहा जाता है कि काशी का राजा डोम था। उत्तर प्रदेश में ही विंध्यवासिनी देवी की पूजा की जाती है।

दरअसल जब से स्त्री की सत्ता छीनी गई तब से उसकी पूजा की जाने लगी। दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत में आज भी कई जगहों पर मातृसत्तात्मक समाज है। लेकिन पूरे उत्तर भारत का समाज मातृसत्तात्मक है। 

यहां आज भी कन्या भ्रूण हत्या, दहेज और खाप पंचायतों द्वारा प्रेम करने पर स्त्रियों की जान ले ली जाती है। दूसरी तरफ हम देखते हैं कि यही समाज दूर्गा की भी पूजा करता है।


यथार्थ यह है कि स्त्रियों की स्थिति यहां अच्छी नहीं है। मुझे लगता है कि स्त्री सशक्तीकरण पर विचार करते हुए हमें पितृसत्तात्मक समाज की स्थापना पर गौर करना चाहिए। यूनानी सभ्यता में इडीपस की जीत पितृसत्तात्मक समाज की जीत मानी जाती है।


इस समय स्त्री पर ज्यादा जोर इसलिए दिया जा रहा है कि पुरुषसत्तात्मक समाज व्यवस्था के समने कई तरह की अस्मिताएं आ खड़ी हुई हैं। अस्मिताओं में बंटे समाज में जातियों, धर्मों आदि के टुकड़े करने पड़ेंगे। 

भारतीय समाज की संरचना यूरोप से भिन्न है, इसलिए यहां यूरोप की तरह सिर्फ स्त्री और पुरुष के बीच समाज को बांट कर नहीं देखा जा सकता। दलित कहां जाएंगे? आदिवासी कहां जाएंगे? हाशिए पर की कई और अस्मिताएं कहां जाएंगी? जेंडर भारत का अकेला मसला नहीं है। इसके साथ और भी कई गंभीर मुद्दे हैं।


यह सच है कि भारत की स्त्रियां आज घर से बाहर निकल रही हैं, लेकिन वह शिकार भी हो रही हैं। रॉबर्ट जेनसेन की बहुचर्चित किताब ‘‘गेटिंग ऑफ: पोर्नोग्राफी एंड दि एंड ऑफ मेस्कुलिनिटी’’ में उन्होंने माना है कि भूमंडलीकरण के बाद विज्ञापन, बाजार और नव साम्राज्यवादी आचरण के पीछे सबसे पहला मुखौटा स्त्री का है।

रॉबर्ट जेनसेन बाजारवादी नारीवाद को ग्लोबल पोर्न इंडस्ट्री का ही विस्तार मानते हैं। स्त्री मुकित आंदोलन के इस रूप को बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों तक चलनेवाले उस स्त्री स्वाधीनता संग्राम के साथ जोड़ पाने में कई बार मुझे भी मुश्किल होती है जिसमें स्त्री ने समाज के दलित और वंचित तबकों की मुक्ति का सपना देखा था।

इस संदर्भ में देखें तो हमारे सामने क्लारा जेटकिन, क्रुप्स काया, लेनिन की बीवी, एरन गुल, सीमोन द बोउवार, केट मिलेट और भारत में कस्तूरबा से लेकर बहुत सारी महिलाएं थीं, और आज भी मेधा पाटकर, वंदना शिवा, अरुंधति रॉय, सुनीता नारायण, आंग सान सूकी, इरोम शर्मिला आदि ऐसी महिलाएं हैं जो आज की सत्ता के विरुद्ध समूचे मानवीय समाज की मुक्ति के लिए संघर्ष कर रही हैं। इन्होंने कभी जेंडर का नारा नहीं दिया। इनका कोई गॉड फादर नहीं है।

दरअसल भारत में स्त्री मुक्ति का सवाल हाशिए पर के कई अन्य समूहों की मुक्ति से जुड़ा हुआ है। स्त्री को मुक्त करते हुए हमें पूरे समाज को मुक्त करना होगा। यह सच है कि यह शताब्दियों से सबसे उत्पीड़ित अस्मिता रही है और जब तक यह ऐसी अन्य अस्मिताओं को साथ नहीं लेती तब तक वह बाजार और अन्य पितृसत्तात्मक सत्ता का लाभ लेकर भले लाभ उठाए, यह एक खास वर्ग का ही सत्तारोहण होगा, स्त्री की मुक्ति का नहीं। मुझे लगता है इस बात को जनता समझ चुकी है।

यह मत भूलें कि विजय लक्ष्मी पंडित से लेकर इंदिरा गांधी, मार्गेट थैचर और सोनिया गांधी तक, जयललिता से लेकर मायावती तक और भंडारनायके से लेकर शेख हसीना वाजिद तक सत्ता के शिखर तक पहुंचने वाली महिलाएं स्त्री नहीं बलिक पुरुष सत्ता की ही प्रतीक रही हैं, और यही बात संसकृति ओर साहित्य में भी लागू होती है। ये गॉड फादर्स की सत्ताएँ थीं और हैं, मां की सत्ता की प्रतिष्ठा कहीं नहीं हुई।


फासीवाद के बाद सबसे ज्यादा दमन फॉकलैंड वार में मार्गेट थैचर ने किया। इंदिरा गांधी ने भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार इमरजेंसी लागू किया और लागों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीनी। बेगम खलिदा जिया बांग्लादेश में फौजी शासन लागू किया। जेंडर की निगाह से सत्ता को देखना मेरे लिए कभी सुकूनदेह नहीं रहा, क्योंकि मेरे लिए मान्यताओं का मूल्यांकन मायने रखता है।

स्त्री मुक्ति की राह में देह सबसे बड़ी बाधा : अनामिका
अनामिका
भारतीय परंपरा में शिव का संबंध शक्ति से है। शक्ति का सीधा संबंध स्त्री से है, स्त्री का प्रकृति से और प्रकृति का संबंध शक्ति से। शक्ति का ताल्लुक दुर्गा से है और दुर्गा को आद्य शक्ति कहा गया है। शक्ति के बिना मनुष्य शव के समान है। शक्ति का संचार होते ही वह सजीव, सचेतन और सक्रिय हो जाता है। शक्ति के बिना शिव भी शव के समान माने जाते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो किसी भी पदार्थ में शिवत्व की शक्ति मंगल भाव से आती है। जब हम किसी देवता के आगे सिर झुकाते हैं तो तो हम उसकी शक्ति के आगे सिर झुकाते हैं और हमें लगता है कि वहां से एक तरह की एनर्जी हमारे भीतर आ रही है। 

देवी की पूजा इसलिए की जाती है क्योंकि उन्हें शक्ति स्वरूपा माना जाता है। उनके अंदर ममता, क्षमा, न्याय की शक्ति होती है। ममता और क्षमा से जब बात नहीं बनती तब न्याय की बात की जाती है। सांस्कृतिक रूप से इसे समझा जा सकता है।

आज की स्त्री जितनी थकी और हारी हुई है और सशक्तीकरण के लिए संघर्ष कर रही है उसे आधुनिकता के संदर्भ में समझने की जरूरत है। दरअसल स्त्री सशक्तीकरण की प्रक्रिया एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है। मध्यकालीन भारतीय समाज व्यवस्था में स्त्रियों की दशा अनुकूल नहीं थी।

उन्नीसवीं सदी में भारत में जब नवजागरण की शुरुआत हुई और स्वाधीनता आंदोलन में भारतमाता की जो छवि गढ़ी गई उसमें शक्ति का वही स्वरूप देखी गई। उस दौरान राजाराम मोहन राय एवं अन्य नवजागरणवादियों ने सती प्रथा, बाल विवाह का विरोध किया और विधवा विवाह की हिमायत की। लेकिन मुझे लगता है कि उस वक्त स्त्रियों के राजनीतिक चेतना की बात नहीं उठाई गई।

महात्मा गांधी जब आए तो उन्होंने कहा कि अगर मानसिक और नैतिक बल की बात की जाए तो स्त्रियां ज्यादा नैतिक और सशक्त हैं। मुझे लगता है कि महात्मा गांधी ने पहली बार इस बात को समझा कि भारतीय स्त्रियां जब पढ़-लिख कर अपनी राजनीतिक चेतना के साथ सड़क पर आएंगी तो वे दहेज एवं अन्य सामाजिक कुप्रथाओं के खिलाफ ताकतवर रूप से खड़ी होंगी, और तभी भारतीय स्त्री समाज में सच्चे नवजागरण की शुरुआत होगी। उसके बाद हमने देखा कि भारतीय स्त्रियां पढ़-लिकर चेतना संपन्न होने लगी और बहुत सारी स्त्रियों ने आजादी की लडाई में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।

आजादी के बाद भारतीय स्त्रियों पर एक बड़ी जिम्मेदारी आई। पहले की स्त्री तन और मन से अपने परिवार की सेवा करती थी लेकिन आजादी के बाद वह तन, मन और धन से अपने परिवार की सेवा करने लगी, जिसके दायरे में रक्त और यौन संबंध के अलावा घर से बाहर, समाज, राजनीति और कार्यस्थलों पर बनाए गए उसके कई संबंध भी शामिल हुए। यानि कहा जा सकता है कि आधुनिक स्त्री ने अपने दिल का दायरा बढ़ाया।

जहां तक स्त्री शक्ति का सवाल है तो हर पुरुष की जिंदगी का सबसे यादगार संबंध किसी न किसी स्त्री से जुड़ा होता है, चाहे वह मां के साथ जुड़ा हो या बहन के साथ अथवा प्रेमिका, पत्नी और बेटी के साथ। जब कभी काई पुरुष बाहर की दुनिया से थक-हार कर घर आता है तो उसे सबसे ज्यादा नैतिक और भावनात्मक सुरक्षा और समर्थन उसे स्त्री की तरफ से ही मिलती है। 

लेकिन आज भी स्त्री के सामने पुरुष का चेहरा उसे कमतर ही आंकते हुए, उसे आंखें दिखाते हुए और मारते-पीटते हुए ही आता है। पुरुषों ने अपना चित्त विस्तार नहीं किया। पुरानी मानसिकता के पुरुषों में आज भी पूर्वग्रह बचे हुए हैं। उनको मांज-मांज कर ठीक करना है, जिस तरह गंदे बर्तन को मांज-मांज कर चमकाया जाता है उस तरह।

स्त्री आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि स्त्रियां मनोवैज्ञानिक तरीके से आंदोलन करती हैं। स्त्री के हक की लड़ाई लड़ रही स्त्रियों ने कभी शस्त्र नहीं उठाया है। स्त्री सशक्तीकरण आंदोलन हमेशा निःशस्त्रीकरण को प्रश्रय देता रहा है। इस पर गौर करने की जरूरत है।


पर्यावरण की सुरक्षा के लिए जूझ रही हैं स्त्रियां। स्त्रियां हमेशा अपने समय के जो वृहत्तर संदर्भ रहे हैं उन्हें साथ लेकर चलती रही हैं। पश्चिम में रेडिकल फेमिनिज्म अश्वेतों के अधिकार दिलाने की लड़ाई में उनके साथ खड़ा था।


आज यह देखकर खुशी होती है कि भारत में गांव-गांव की स्त्रियों में भी यह चेतना आ रही है। वे अपने और अन्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सरोकारों के प्रति जागरूक हो रही हैं। स्त्री के अंदर की दुर्गा शक्ति अब जाग चुकी है। 

गांव-देहात से लेकर चौपाल तक वह अपने और वृहत्तर मानवीय सरोकारों के लिए उठ रही है। हालांकि देह अभी भी स्त्री मुक्ति की राह में एक बड़ी बाधा है। दुर्गा को भी इसीलिए शस्त्र उठाना पड़ क्योंकि महिषासुर उनके साथ विवाह करना चाहता था।
(शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित. राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित.)

रविवार, 25 सितंबर 2011

अदम्य जिजीविषा का विनम्र कवि कुंवर नारायण

कुंवर नारायण
मित्रो, बीते 19 सितम्बर को हिंदी के सम्मानित कवि कुंवर नारायण 85 वें साल में प्रवेश कर गए. कुंवर जी की प्रतिष्ठा और आदर हिंदी साहित्य की भयानक गुटबाजी के परे सर्वमान्य है. उनकी ख्याति सिर्फ लेखक की तरह नहीं, बल्कि कला की अनेक विधाओं में गहरी रुचि रखनेवाले रसिक विचारक की भी है. आज के 'हिंदुस्तान' में पढ़िए कुंवर जी पर मेरा आत्मीय आलेख शुक्रिया. - शशिकांत 
 
'मेरी मां, बहन और चाचा की टीबी से मौत हुई थी। यह सन् 35-36 की बात है। मेरे पूरे परिवार में प्रवेश कर गयी थी टीबी। उन्नीस साल की मेरी बहन बृजरानी की मौत के छह महीने बाद 'पेनिसिलीन' दवाई मार्केट में आयी। डॉक्टर ने कहा था, 'छह महीने किसी तरह बचा लेते तो बच जाती आपकी बहन।'
बीच में मुझे भी टीबी होने का शक था। चार-पाँच साल तक हमारे मन पर उसका आतंक रहा। ये सब बहुत लंबे किस्से हैं। बात यह है कि मृत्यु का एक ऐसा भयानक आतंक रहा हमारे घर-परिवार के ऊपर जिसका मेरे लेखन पर भी असर पड़ा।

मृत्यु का यह साक्षात्कार व्यक्तिगत स्तर पर तो था ही सामूहिक स्तर पर भी था। द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद सन् पचपन में मैं पौलेंड गया था। विश्वनाथ प्रताप सिंह भी गए थे मेरे साथ। वहाँ मैंने युद्ध के विध्वंस को देखा। तब मैं सत्ताइस साल का था। इसीलिए मैं अपने लेखन में जिजीविषा की तलाश करता हूँ। मनुष्य की जो जिजीविषा है, जो जीवन है, वह बहुत बड़ा यथार्थ है।


लोग कहते हैं कि मेरी कविताओं में मृत्यु ज्यादा है लेकिन मैं कहता हूँ कि जीवन ज्यादा है। देखिए, मृत्यु का भय होता है लेकिन जीवन हमेशा उस पर हावी रहता है। दार्शनिकता को मैं न जीवन से बाहर मानता हूँ और न कविता से। कविता में मृत्यु को मैंने इसलिए ग्रहण किया क्योंकि वह जीवन से बड़ा नहीं है। इसे आप मेरी कविताओं में देखेंगे। मैंने हमेशा इसको ‘एसर्ट’ किया है। ‘आत्मजयी’ कविता में भी मैंने इसी शक्ति को देखा है।'

अपनी कविता के केंद्र में मृत्यु की वजह बतलाते हुए कुंवर जी भावुक नही होते, क्योंकि मृत्यु को उन्होंने करीब से देखा है और उससे जूझकर निकले हैं। वे कहते हैं, 'हम मृत्यु पर विजय नहीं पा सकते लेकिन मृत्यु के भय पर विजय जरूर पा सकते हैं। मृत्यु मनुष्य को भयाक्रांत करता है। कुछ लोग मृत्यु के भय से टूट जाते हैं। साहित्य मृत्यु के इस भय से निकलने में हमारी मदद करता है। वह हमारे अंदर की जिजीविषा को जगाए रख सकता है। 'आत्मजयी' और अपनी अन्य रचनाओं में मैंने यही कोशिश की है।'

इस संदर्भ में कुंवर जी प्रख्यात दार्शनिक सुकरात की जिंदगी के आखिरी लम्हो में घटी एक घटना को उद्धृत करते हैं, 'सुकरात को जब जहर दिया जा रहा था तो उससे ठीक पहले वे संगीत का एक नया राग सीख रहे थे। किसी ने जब उनसे पूछा तो उन्होंने कहा, 'मरने से पहले यदि कोई नयी चीज सीख लूं तो इसमें क्या हर्ज है? मैं मरने से पहले एक नया राग सीख लेना चाहता हूं।'

फिर कहते हैं, 'गालिब को पढि़ये। गालिब एक जिंदादिल शायर थे। गालिब ने मृत्यु पर बहुत से अशआर लिखे हैं। लेकिन गालिब मृत्यु के शायर नहीं,, जिंदगी के शायर हैं।'

उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में 19 सितंबर 1927 को पैदा हुए कुंवर नारायण इस भयानक पारिवारिक हादसे के बाद लखनऊ आ गए। आगे की दास्तान-ए-जिंदगी उन्हीं की जुबानी सुनिये, 'फैजाबाद में आज भी मेरा पुश्तैनी घर है लेकिन अब वहाँ कोई नहीं रहता। बहुत शुरू में सन् ’40 के दशक में मैं लखनऊ आ गया था। लखनऊ आने की एक वजह वहां की शिक्षा व्यवस्था थी और दूसरी टीबी से मां, बहन और चाचा की मौत। उसी समय द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ था और पढ़े-लिखे लोगों के बीच उसकी काफी चर्चा रहती थी।'    

पारिवारिक मौत के इन हादसों के बीच उनके अंदर की अपार जिजीविषा ही थी जिसकी बदौलत नयी कविता आंदोलन का यह सशक्त हस्ताक्षर आज भी हमारे बीच उपस्थित है। कुँवर जी अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ के प्रमुख कवियों में रहे हैं।


अपनी रचनाशीलता में इतिहास और मिथक के जरिये वर्तमान को देखने के लिए भी कुँवर जी प्रसिद्ध हैं। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित इस कवि का रचना संसार इतना व्यापक एवं जटिल है कि उसको कोई एक नाम देना सम्भव नहीं। कुंवर जी की मूल रचना विधा कविता भले रही है लेकिन उन्होंने कहानी, लेख व समीक्षाओं के साथ-साथ सिनेमा, रंगमंच एवं अन्य कलाम माध्यमों पर भी बखूबी लेखनी चलायी है। उनकी कविताओं का कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।

लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाई के अपने दिनों को याद करते हुए कुँवर जी बतलाते हैं, 'कॉलेज और यूनिवर्सिटी के अनुभव का मैं कृतज्ञ हूँ। स्कूल के अनुभव अच्छे नहीं थे। कॉलेज में विज्ञान का छात्र था। विज्ञान के अध्ययन ने मेरी सोच-समझ को भी प्रभावित किया। अधिक तर्कसम्मत एवं विश्लेषणात्मक ढंग से चीजों और घटनाओं को देखने का नजरिया विकसित हुआ लेकिन वैज्ञानिक सोच का जो असर हुआ उससे मनुष्य जीवन को मानवीय और भावनात्मक ढंग से सोचने में थोड़ा व्यवधान पड़ा है। सारी चीजों को हम तर्कसम्मत ढंग से नहीं समझ सकते, भावनात्मक ढंग से भी सोच सकते हैं।'

एक कवि के लिए जीवन का कोई भी अनुभव साधारण नहीं होता है। वह साधारण को भी असाधारण बना देता है। बतौर कवि कुंवर नारायण कहते हैं, 'कविता में मैं कोशिश करता हूँ कि ज्यादा से ज्यादा चीजें आएँ। मुझे विविधता और विस्तार पसंद है। कविता का यह काम है कि वह हमारी जीवन दृष्टि को बढ़ाती है। सोचने-समझने की दृष्टि देती है। जीवन का अनुभव तो सबके साथ है, लेकिन कविता के द्वारा कवि कितना बड़ा स्पेश बना लेता है, यह कवि पर निर्भर करता है। और कवि जब उसमें सफल हो जाता है तो पढ़ने वाले को लगता है कि अरे ये तो मैं जी चुका हूँ।'

रचनाकार एक वैकल्पिक समाज, देश और दुनिया का निर्माण करना चाहता है, जहां हर किसी के लिए जगह हो। कुंवर जी कहते हैं, 'आज जब देश और समाज के बार में सोचता हूँ तो लगता है कि विविधता जरूरी है, एकता जरूरी है लेकिन विविधता नष्ट नहीं हो क्योंकि भारतीय संस्कृति में विविधता का बहुत अधिक महत्त्व है।’

हिन्दुस्तान की बहुलतावादी संस्कृति का जिक्र करते हुए वे संगीत में मुसलमानों की भूमिका और अपने संगीत प्रेम पर बोलने लगते हैं, ‘आज हम कलाओं में मुसलमानों को अलग-थलग करना चाहें तो भी नहीं कर सकते। इस तरह की कुचेष्टा राजनीति खासकर अंग्रेजी राजनीति ने की है। करीम खाँ, बिस्मिल्ला खाँ, बड़े गुलाम अली खाँ आदि के योगदान को हम कैसे भूला सकते हैं। स्वयं अकबर के दरबार में तानसेन नवरत्नों में एक थे। डागर बंधुओं का संगीत सुनिए। लखनऊ गया था। रहीमुद्दीन खाँ डागर से मिला तो वेद की ऋचाओं को शुद्ध उच्चारण सुनकर दंग रह गया। मेरे दिमाग में उनका उच्चारण और श्लोक आज भी है।

मैं जब उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादेमी का उपाध्यक्ष बना तो मुझे संगीतकारों के संपर्क में और निकट आने का अवसर मिला। संगीत से पुराना नाता रहा है मेरा। मैं फैयाज खाँ, ओंकारनाथ ठाकुर, अच्छन महाराज, शंभु महाराज आदि से अक्सर मिलता-जुलता था। उनके सान्निध्य ने मेरे साहित्यिक संस्कृति को कई स्तरों पर प्रभावित किया। फिल्म फेस्टिवल पर भी लिखता रहा हूँ। विष्णु खरे, विनोद भारद्वाज और प्रयाग शुक्ल के साथ मिलकर हमने सोचा कि हिंदी में फिल्म समीक्षा उपेक्षित है। दरअसल बचपन से ही मुझे सिनेमा देखने का शौक था। हजरतगंज (लखनऊ) में तीन सिनेमा हॉल थे जिनमें रोज शाम को सिनेमा देखता था। ये सन् 40, 50 और 60 की बात है।'


फिल्मों में कुँवर जी की दिलचस्पी की एक खास वजह है। दरअसल कुंवर नारायण को फिल्म माध्यम और कविता में काफी समानता दिखती है। वह कहते हैं, 'जिस तरह फिल्मों में रशेज इकट्ठा किए जाते हैं और बाद में उन्हें संपादित किया जाता है उसी तरह कविता रची जाती है। फिल्म की रचना-प्रक्रिया और कविता की रचना-प्रक्रिया में साम्य है। आर्सन वेल्स ने भी कहा है कि कविता फिल्म की तरह है। मैं कविता कभी भी एक नैरेटिव की तरह नहीं बल्कि टुकड़ों में लिखता हूँ। ग्रीस के मशहूर फिल्मकार लुई माल सड़क पर घूमकर पहले शुटिंग करते थे और उसके बाद कथानक बनाते थे। क्रिस्तॉफ क्लिस्वोव्स्की, इग्मार बर्गमैन, तारकोव्स्की, आंद्रेई वाज्दा आदि मेरे प्रिय फिल्मकार हैं। इनमें से तारकोव्स्की को मैं बहुत ज्यादा पसंद करता हूँ। उसको मैं फिल्मों का कवि मानता हूँ। हम शब्द इस्तेमाल करते हैं, वो बिम्ब इस्तेमाल करते हैं, लेकिन दोनों रचना करते हैं। कला, फिल्म, संगीत ये सभी मिलकर एक संस्कृति, मानव संस्कृति की रचना करती है लेकिन हरेक की अपनी जगह है, जहाँ से वह दूसरी कलाओं से संवाद स्थापित करे। साहित्य का भी अपना एक कोना है, जहाँ उसकी पहचान सुदृढ़ रहनी चाहिए। उसे जब दूसरी कलाओं या राजनीति में हम मिला देते हैं तो हम उसके साथ न्याय नहीं करते। आप समझ रहे हैं न मेरी बात?', वे पूछते हैं।


क्या कला और साहित्य की कोई स्वायत्त दुनिया होती है या वह सीधे-सीधे हमारे सामाजिक जीवन से संचालित होती है?श् यह एक ऐसा सवाल है जो कला माध्यमों को एक तरफ स्वान्तः सुखाय बनाम बहुजन हिताय के विवाद की ओर ले जाता है और दूसरी ओर कला के लिए कला या जीवन के लिए कला की ओर! लेकिन कुंवर जी इस सवाल को व्यष्टि और समष्टि के अंतर्संबंध से भी जोड़ देते हैं, 'मैं इन्हें विभाजित करके नहीं देखता हूँ। चीजें सापेक्ष होती हैं। एक कविता के लिए, एक चित्रकार के लिए गुलाब का महत्त्व है, लेकिन कैसे इसके बारे में हम समग्रतापूर्वक सोचें, यह क्षमता अब क्षीण हो गई है। यह शायद विज्ञान ने किया है। हम तार्किक विश्लेषण करने लगे हैं। हमारे जीने और देखने में ये विरोधाभास है कि हम जीते और तरीके से हैं जबकि सोचते और तरीके से हैं। समाज इंटीगरल रूप में है इसीलिए हम व्यक्ति और समाज को एक-दूसरे के पूरक मानते हैं। एक भला आदमी उतना ही सामाजिक होता है जितना निजी होता है।'


'मुझे कभी-कभी लगता है कि साहित्य एक ऐसी विधा है जो हर कला और विषय के बारे में अपनी एक सोच रखती है। एक राजनीतिज्ञ विशुद्ध रूप से राजनीतिज्ञ होता है और एक चित्रकार विशुद्ध रूप से एक चित्रकार। इस मायने में सत्यजीत रे को मैं उद्धृत करना चाहूँगा। वे साहित्यकार भी उतने ही बड़े थे जितने बड़े फिल्मकार। प्रेमंचद की कहानी 'शतरंज के खिलाड़ी' पर फिल्म बनाने के दौरान लखनऊ में अक्सर मेरे घर आकर बैठते थे। यह जानकर किसी को आश्चर्य हो सकता है कि वे वाल्टर बेंजामिन पर भी मेरे साथ उतने ही अधिकार से बातचीत करते थे जितनी फिल्मों पर', उन्होंने बतलाया।


अपने भीतर अपार जिजीविषा और जीवनानुभव का एक विराट संसार संजोए आज भी सक्रिय हैं कुंवर नारायण। उनका पूरा का पूरा रचना संसार इसका गवाह है। एक नहीं, कई-कई मौत के साक्षी रहे और खुद जानलेवा बीमारी को परास्त कर चैरासी साल की उम्र के कुंवरजी आज एक दार्शनिक, विचारक, इतिहासद्रष्टा, कला के विभिन्न माध्यमों का पारखी और कई-कई रूपों में हमारे बीच विद्यमान है।

शनिवार, 17 सितंबर 2011

हिंदी की पहली अहम लड़ाई उसके अपने ही सांस्थानिक ढांचों से है: उदय प्रकाश


उदय प्रकाश

मित्रो, 
20 वीं सदी के उत्तरार्ध और 21 वीं सदी के जिस शुरुआती दौर के हम गवाह हैं यह एक भयानक समय है. यह एक ऐसा डरावना समय है जिसमें सत्ताएँ अपनी गिरोहबंदी, जातिवाद, क्षेत्रीयतावाद, साम्प्रदायिकता, भ्रष्ट आचरण वगैरह की वजह से व्यापक लूटतंत्र का हिस्सा बनकर आम जनता का विश्वास खो चुकी हैं. ऐसे कठिन समय में एक लेखक नाफा-नुकसान की फिक्र किए बगैर अपनी कहानियों और कविताओं में इस जटिल समय की माइक्रो रियलिटी को बेबाक तरीक़े से अभियक्त करने के ख़तरे उठाता रहा है और इसकी सज़ा भी भुगतता रहा है. हेर-फेर में लगी इन सत्ताओं को बार-बार आईना दिखाने का दुस्साहस करनेवाले इस कथाकार, कवि, पत्रकार, फिल्मकार का नाम है उदय प्रकाश. आज 17 सितम्बर के दैनिक भास्कर, नई दिल्ली संस्करण में उदय प्रकाश ने हिंदी के सत्ता समाज में सक्रिय ऐसे ही मठाधीशों को आईना दिखाने वाला एक लेख लिखा है. आपकी खिदमत में पेश है, दैनिक भास्कर से साभार. पसंद आए तो श्री विमल झा को शुक्रिया बोल सकते हैं न पसंद आए तो...आपकी मर्ज़ी ! शुक्रिया. - शशिकांत    

सारे पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों को छोड़ कर इस सच को अब मान ही लेना चाहिए कि ‘हिंदी’ एक बहुत अधिक समस्याग्रस्त शब्द है। यह उतना निरापद और एकार्थी, सीधा-सादा और निर्दोष, सर्वानुमोदित और निर्विवाद शब्द नहीं है, जैसा इसके समर्थक और हिंदी से जुड़े राजकीय अथवा निजी संस्थान या व्यावसायिक उद्यम, जिसमें कई तरह के हित-समूहों के वर्चस्व के अधीन अखबार और मीडिया चैनल भी शामिल हैं, अपने-अपने विद्वानों के साथ दावा करते रहते हैं। 

हिंदी कोई ऐसी भाषा नहीं है, जो अपने विकास के किसी चरम को हासिल कर चुकी है और अब हमेशा के लिए जड़ीभूत हो कर स्थिर हो चुकी है। यह न संस्कृत की फॉसिल (जीवाश्म) है, न अन्य जीवित देशी-विदेशी-इलाकाई भाषाओं के साथ लगातार और रोजाना सहवास से अपवित्र और कुलटा हो चुकी उसका ऐसा ‘अपभ्रंश’, जिसे दैवी तत्सम के मंत्रोच्चार से पवित्र बनाने का राजसूय यज्ञ इसके राज-पुरोहित करने में खुसरो-भारतेंदु-प्रेमचंद युग से लेकर आजतक लगे हुए हैं। 

यानी तबसे, जब से यह भाषा किसी कदर आधुनिक होकर जीवित ‘जनभाषा’ हो पाने के अपने अनिवार्य संघर्ष में पहली बार कभी सक्रिय हुई थी। इसके व्यावहारिक शब्दकोष में अब हर रोज इतने परदेशी और विजातीय शब्द सम्मिलित हो रहे हैं कि इसे थामा नहीं जा सकता। इसे न हिब्रू बना कर संरक्षित किया जा सकता है, न जेड या अवेस्ता। असली हिंदी जीवित जन-भाषा के रूप में बचे रहने के लिए प्राणपन से जूझ रही है। 

हिंदी की पहली अहम लड़ाई उसके अपने ही सांस्थानिक ढांचों, जो प्रतिगामिता और अतीतजीवी जड़ता के असली अड्डे या ‘मठ’ हैं, के साथ है। ठीक इसी तरह, इतनी ही गंभीर और निर्णायक लड़ाई इस भाषा की अपनी ही बद्धमूल अवधारणाओं और लगभग अंतिम तौर पर परिभाषित कर डाली गईं उन व्याख्याओं-विधानों-संहिताओं-प्रत्ययों के साथ है, जो और कुछ नहीं, इस भाषा के ही भीतर प्रच्छन्न रूप में सक्रिय हिंदीभाषी पट्टी की सामाजिक-जातीय-क्षेत्रीय संरचनाएं हैं। इन संरचनाओं की शिनाख्त और इनको समझे बिना किसी ‘भाषा’ के रूप में हिंदी के बारे में कोई वास्तविक विमर्श मुमकिन नहीं है। 

बीसवीं सदी में प्रख्यात भाषा-चिंतक वोलासिनोव, जिन्हें हम बाख्तिन के नाम से भी जानते हैं, ने किसी भी भाषा के हर शब्द को एक ऐसा संकेतक माना था, जो उस भाषा को बोलने वाले अलग-अलग वर्गों-समूहों को अलग-अलग, और अक्सर अंतर्विरोधी संकेत देता था। यानी किसी भी ‘शब्द’ का कोई भी एक ‘अर्थ’ सर्वानुमोदित, वर्गातीत और समाज-निरपेक्ष नहीं होता। जब कोई भी समाज अपने परिवर्तन के सबसे उथल-पुथल से भरे अतिसंवेदनशील और परिवर्तनकारी दौर में दाखिल होता है तो किसी भी भाषा का हर शब्द उन्हीं परस्पर विरोधी टकराहटों का केंद्र या नाभिक बन जाता है, जिन टकराहटों और अंतर्विरोधों से वह समाज गुजर रहा होता है। 

इतिहास गवाही देता है कि अठारहवीं सदी में फ्रांस में निरंकुश राज्यतंत्र को सत्ता से अपदस्थ करने वाला लोकतंत्र तब जन्मा था, जब ‘भूख’ जैसे मामूली और बुनियादी मानवीय शब्द का अर्थ राजा-रानियों के लिए ‘केक’ और गरीब जनता के लिए ‘रोटी’ हो गया था। एक ही भाषा के बिल्कुल साधारण और निरापद से लगने वाले शब्द ‘भूख’ के भीतर मौज़ूद दो अलग-अलग विरोधी संकेतों के ऐतिहासिक, सभ्यतामूलक महासमर के रक्तपात के बीच ही उस सन् 1789 वाले महान लोकतंत्र का जन्म हुआ था, जिसमें हम आज भी रह रहे हैं। 

आज भी हम जिन संकेतों अथवा शब्दों को अच्छी-खासी लापरवाही और बिना दुविधा के इस्तेमाल करते हैं, मसलन- ‘विकास’, ‘अधिकार’, ‘संपन्नता’, ‘शिक्षा’, ‘चिकित्सा’, ‘घर’ आदि, वे भी एकार्थी और सर्वानुमोदित या लोकानुमोदित नहीं हैं। इन सारे शब्दों के भीतर अर्थों-अभिप्रेतों के विकट अंतर्विरोध हैं। ‘केक’ और ‘रोटी’ की तरह ही, आर्थिक असमानता की हर रोज दुर्लंघ्य होती जाती खाई और अलग-अलग जातीय-वर्गीय समुदायों के बीच लगातार बढ़ी टकराहटों की वजह से, आज हिंदी भी गृहयुद्ध की स्थिति में हैं। 

सच तो यह है कि आज की व्यवहार में आने वाली हिंदी का कोई एक रूप नहीं है। इसमें इलाकाई ही नहीं, जातीय भिन्नताएं भी बहुत हैं, जो मीडिया और उच्च-वर्गीय साहित्यिक-सांस्कृतिक अथवा राजकीय हिंदी में भले ही न दिखता हो, लेकिन सृजनात्मक लेखन और बोल-चाल के धरातल पर आते ही, उसकी विविधता सामने आ जाती है। इस विविधता को सपाट नहीं किया जा सकता। यह न सिर्फ अलोकतांत्रिक होगा, बल्कि बहुतेरे कारणों से हर रोज बदलती हिंदी के विकास के विरुद्ध यह एक प्रतिगामी कदम होगा। 

सबसे बड़ी और क्षेत्र-जाति-धर्म बहुल भाषा होने के कारण ‘हिंदी’ अब निस्संदेह ‘पानीपत का मैदान’ या ‘महाभारत का कुरुक्षेत्र’ बन चुकी है। याद रखें, भाषा सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं, एक मानवीय संसाधन भी है, जिस पर किसी भी अस्मिता या जाति के एकाधिकार को लंबे समय तक बनाए रखने की कोई भी दुरभिसंधि, वह चाहे जिन उदार, आधुनिक या प्रगतिशील मुखौटों के साथ प्रस्तुत हो, पहले की तरह अब अगोचर नहीं रह सकती। इसका छद्म उघड़ चुका है और यह अब भाषा के भीतर किसी भी प्रतिगामी और दकियानूस, लेकिन फिर भी वर्चस्वशील भ्रष्ट और क्रूर सत्ता-संरचना के रूप में पहचानी जा चुकी है। 

संयोग से वर्णाश्रम व्यवस्था की मध्यकालीन सामंती संस्कारों और जातीय बनावट में आज भी जी रहे हिंदी-समाज की भाषा हिंदी ही है, जो एक तरफ अब इस दायरे से बाहर निकल कर अन्य समाजों की ओर और दूसरी तरफ देश के अन्य सार्वजनिक संसाधनों (जिनमें से एक भाषा भी है) और अवसरों पर लोकतांत्रिक अधिकारों और बहुसंख्यक जातीय समुदायों की आनुपातिक साझेदारी के लिए बढ़ते दबावों को झेल रही है। 

साहित्य, संस्कृति, शिक्षा और जन-संचार माध्यमों के इलाकों में किसी एक या एकाधिक खास जातियों की अब तक चली आ रही इजारेदारी के सामने यह पहली बड़ी ऐतिहासिक चुनौती का समय है। अपने हितों और लंबे निरंकुश भ्रष्ट शासन की हिफाजत में विचारधाराओं और छद्म राष्ट्रवाद से लेकर धर्म और संस्कृति जैसे तमाम महावृत्तांतों के वागाडंबर से खड़ी की जा रही इसकी भ्रष्ट किलेबंदी के विरुद्ध अब किसी एक वास्तविक भाषाई जन-लोकपाल की प्रतीक्षा है, जो इस भाषा पर भ्रष्ट जातिवादी वर्चस्व को तोड़ सके। 

अभी दो-तीन साल पहले हिंदी के व्यावहारिक-रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होने वाली साझी-शब्दावली या ‘शेयर्ड वोकेबुलरी’ में अंग्रेजी और अन्य विजातीय (विदेशी नहीं) शब्दों की बेतहाशा बढ़ती जाती संख्या के भय में ‘हिंदी के क्रियोलीकरण’ का मुद्दा बहुत जोर-शोर से उठाया गया था। यह निरर्थक था। सबसे अधिक भय अंग्रेजी के प्रति पैदा किया जा रहा था। अगर ध्यान से देखें तो स्वयं अंग्रेजी भी आज अन्य भाषाओं के शब्दों से अटी पड़ी है। 

अब यह ब्रिटिश राज की शाही और पवित्र अंग्रेजी नहीं है, जिसके पुरोधा नीरद सी. चौधरी जैसे लोग माने जाते थे, अब अंग्रेजी आप्रवासियों ही नहीं, उन सभी देशों-समाजों की भाषाओं के शब्दों की भीड़ से घिर चुकी है, जहां-जहां वह विश्व-भाषा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की भाषा होने के कारण पहुंच रही है। पॉपुलर कल्चर, कालसेंटर और आउटसोर्सिंग ने खुद अंग्रेजी को बदल डाला है। यही अंग्रेजी के लगातार विकसित होने की वजह और शक्ति भी है। सवर्ण पारंपरिक तत्सम प्रधान हिंदी अगर देखें तो खुद संस्कृत का क्रियोल है और इसकी वर्जनाएं इसकी अधोगति और जड़ता का कारण बनेंगी। 

ऐसा ही एक मुद्दा ‘लिपि’ को लेकर भी है। क्या आज की विस्तृत होती, अन्य भाषाई-सांस्कृतिक इलाकों और देशों तक पहुंचती जाती हिंदी को सिर्फ किसी एक लिपि में कैद रखा जा सकता है ? यूनिकोड और मोबाइल-नेट की नई संस्कृति की नई दखल ने हिंदी की लिपि-बद्धता की सीमाओं को लांघना और तोडऩा शुरू कर दिया है। 

यह सच है कि अभी तक किसी भी भाषा की लिपियां और उसकी वर्णमालाएं महज किसी भाषा को लिखित में संरक्षित करने का माध्यम या उपकरण भर नहीं, बल्कि जातीय-सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी थीं। लेकिन आज हम जिस सार्वभौमिक यथार्थ के सामने हैं, उसने अपने लिए एक अनोखी और ऐतिहासिक दृष्टि से अभूतपूर्व ‘लिपि-संसार’ का निर्माण भी करना शुरू कर दिया है। हम अब सिर्फ आर्थिक-राजनीतिक ग्लोबल-गांव में ही नहीं रह रहे हैं, बल्कि धीरे-धीरे ‘ग्लोबल-लिपिग्राम’ के वाशिंदे भी होते जा रहे हैं। दूसरे कई देशों की लिपियां अपनी मूल भाषाई परिवार और अब तक जड़ीभूत हो चुकी सांस्कृतिक-चिन्हों को छोड़ कर, दूसरी, विजातीय लिपियों को अपनाने लगी हैं। 

अगर आपको याद हो तो जब तुर्की के आधुनिक और लोकप्रिय नेता कमाल अतातुर्क ने तुर्क-भाषा को उसकी पुरानी मध्यपूर्वी अरबी-फारसी लिपि से मुक्त करके, आधुनिक पश्चिमी यूरोप की रोमन लिपि से जोड़ा था और इसके लिए सख्त राजकीय आदेश निकाले थे, तब उनका धार्मिक कट्टरपंथियों ने बहुत विरोध किया था। लेकिन अगर तुर्क-भाषा पश्चिमी लिपि से जुड़ कर आधुनिक न हुई होती तो उसमें क्या नाजिम हिकमत जैसे कवि और ओरहान पामुक जैसे नोबेल पुरस्कार प्राप्त कथाकार हो पाते। यह प्रक्रिया आज और भी तेज है। 

अल्जीरिया और मोरक्को जैसे देश भी अपनी भाषाओं के लिए अरबी को छोड़कर रोमन अपना रहे हैं। सबसे रोचक और ताजा उदाहरण तो चेचन्या का है, जहां जब तक रूस का दबदबा रहा, उसकी भाषा की लिपि ‘क्रिलिक’ थी, जिसमें रूसी भाषा लिखी जाती थी, आजाद होने के बाद वहां भी रोमन अपनाई जा चुकी है। 

हिंदी के साथ भी यह होगा। ऐसा होना भी चाहिए तभी यह मात्र एक-दो जातियों की औपनिवेशिक दासता की जंजीरों से मुक्त होकर आधुनिक संसार में सांस ले सकेगी।

शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

युवा पीढ़ी में लोकतंत्र के उत्सव में हिस्सा लेने का उत्साह



मूसलाधार बारिश में भीगते हुए सैकड़ों छात्र-छात्राएं मोतीलाल नेहरू कॉलेज (साउथ कैम्पस) के गेट पर आज सुबह ८ बजे से ही स्टूडेंट यूनियन के चुनाव में वोट डालने के लिए लाइन लगाकर खड़े थे. युवा पीढ़ी में लोकतंत्र के उत्सव में हिस्सा लेने का उत्साह और जूनून देख कर लगा कि हिंदुस्तान में लोकतंत्र की ज़मीन बहुत मज़बूत है. काश, हमारे लोकतंत्र के पहरुओं को यह बात समझ में आ जाए और वे मुल्क़ की लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ खिलवाड़ न करें.

शनिवार, 27 अगस्त 2011

ब्रह्मपुत्र की उदारमना बेटी इंदिरा गोस्वामी


इंदिरा गोस्वामी 
मित्रो,
२१ अगस्त २०११ को दैनिक हिंदुस्तान में प्रकशित मामोनी रायसम उर्फ़ इंदिरा गोस्वामी पर प्रकाशित मेरा यह लेख पढ़ सकते हैं.
शुक्रिया.

-शशिकांत 



‘‘इस लड़की के सितारे इतने ख़राब हैं। इसे दो टुकडे़ करके ब्रह्मपुत्र में फेंक दो’ - यह भविष्यवाणी की थी असम के नवग्रह मंदिर के ज्यातिषी ने मामोनी रायसम गोस्वामी उर्फ इंदिरा गोस्वामी की मां से। तब मामोनी एक नवयुवती थीं। 

उस ज्यातिषी की भविष्यवाणी को झुठलाकर इंदिरा गोस्वामी आज 68 साल की हैं और भारतीय साहित्य का गौरवशाली व्यक्तित्व बन चुकी हैं। उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार और साहित्य अकादेमी पुरस्कार सहित असम राज्य के सबसे प्रतिष्ठित साहित्य सभा पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। तमाम भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनूदित हो चुका है उनका साहित्य। 

हालांकि यह भी सच है कि इस खूबसूरत लेखिका की निजी जिंदगी तकलीफ और संघर्षों से भरी रही, बावजूद इसके कि उनका जन्म एक रईस खानदान में हुआ और उनके इर्द-गिर्द ऐशो-आराम की कोई कमी नहीं थी। ‘‘मेरे फोर फादर लैंडलॉर्ड थे और रिलीजियस हेड भी थे।

उस वक्त हमारे पास लम्बी इम्पोर्टेड कार होती थी और घोड़े-हाथी भी थे। लेकिन हमारे घर का परिवेश बहुत साधारण था क्योंकि फादर ‘सिम्पल लीविंग एंड हाय थिंकिंग’ में विश्वास रखते थे। हालांकि वे एजुकेशन के स्टेट डायरेक्टर थे। उनकी इस थिंकिंग की वजह से हमें बहुत कष्ट झेलना पड़ता था। सिलांग के जिस पाइन माउंट इंग्लिश स्कूल में मैं पढ़ती थी वह हाई क्लास ब्रिटिश स्कूल था, लेकिन हमारे पास सिर्फ दो जोड़ी कपड़े होते थे। फादर ज्यादा कपड़े नहीं देते थे।’’ इंदिरा जी कहती हैं।

बालपन की स्मृतियां आज भी मामोनी के जेहन के किसी कोने में सुरक्षित हैं। रायसम ने बतायाः ‘‘उन दिनों मेरी उम्र पांच-छह साल रही होगी। हमें गांव में गरीब और छोटी जातियों - जो हमारी प्रजा होती थी- के साथ खेलने-कूदने की छूट नहीं मिलती थी। घरवालों की इस मनाही के बावजूद मेरा मन उन्हीं लोगों के साथ खेलने में लगता। लेकिन बुआ खींचकर तुरंत कुएं पर ले जातीं और नहला कर घर ले आतीं।

उसके बाद मेरी लाइफ में एक-एक कर कई प्रॉब्लम आए। मैं काफी दिनों तक डिप्रेशन में रही, खासकर फादर की मौत के बाद। मुझे फादर से बहुत लगाव था। एक तो उनके गुजर जाने का शॉक और फिर एग्जाम में अच्छे मार्क्स भी नहीं आए। सिलेबस की किताबें बोरिंग लगती थीं और अलग-अलग तरह की किताबें पढ़ना अच्छा लगता था। लोगों से मिलती-जुलती भी नहीं थी। मैं अपनी हवेली के पीछे ब्रह्मपुत्र नदी में डूबकर मर जाना चाहती थी। हालांकि उन दिनों मैं काटन कॉलेज, असम में पढ़ती थी। वहां मेरे बहुत सारे ‘एडमायरर’ (चाहनेवाले) थे। बहुत से लड़के मेरे लिए ‘कोटेशन’ लिखते थे। एक तो सच में पागल ही हो गया था। वह मेरे घर के सामने आता और कपड़े उतारकर जमीन पर बैठ जाता। तब मैं अठारह-उन्नीस साल की थी।’’

उसके बाद मामोनी की जिंदगी में एक-एक कर कई तरह के तूफान आए। उन्हीं के शब्दों में, ‘‘असम में उन दिनों लड़कियों की शादी जल्दी कर दी जाती थी। फादर की मौत के बाद रईस खानदान से होने के बावजूद लोग मुझसे शादी करने से हिचकते थे। हालांकि मेरी खूबसूरती पर फिदा बहुत से लड़के मुझसे शादी करना चाहते थे लेकिन मां को वे पसंद नहीं थे। मैं भी नहीं चाहती थी।

एक दिन मैंने अपने गहरे दोस्त अब्दुल हन्नन से कहा कि मुझे नींद नहीं आती। मुझे नींद की गोली ला करके दो। वह मुझे बेहद चाहता था और कहता था कि तुम स्टार भी मांगोगी तो लाकर दूंगा। ‘गार्डीनल’ नींद की गोली बहुत नुकसान करती है। मैंने पूरी बोतल खा ली। उसके बाद सात दिन तक अस्पताल में भर्ती रही। पूरे असम में सनसनी फैल गई। डॉक्टर ने मां से कहा था- अब यह नहीं बचेगी। लेकिन मैं फिर भी बच गई। हालांकि उस घटना को लेकर मुझे बहुत दिनों तक परेशानी झेलनी पड़ी। लोगों में नींद की गोली खाने को लेकर तरह-तरह की अफवाहें फैलीं। इस कारण मुझे घर से बाहर निकलने में दिक्कत होती थी।’’

उस घटना से उबरने में मामोनी को वक्त लगा। उन्हीं की मुंहजबानी सुनिये: ‘‘फिर बहुत दिन बाद दक्षिण भारत का एक नौजवान इंजीनियर मेरे घर के पड़ोस में रहने आया। कई महीने की खामोशी के बाद उसकी मोहब्बत ने मुझे कुछ बोलने की शक्ति दी। ब्रह्मपुत्र के किनारे शाम को हमलोग साथ-साथ घूमते। उसने मेरी मां के सामने मेरे साथ विवाह का प्रस्ताव रखा। लेकिन मां मेरी शादी किसी असमी लड़के के साथ ही करना चाहती थीं। 

आखिरकार वह राजी हो गईं और माधू के साथ मेरा विवाह हो गया। लेकिन कुदरत को मेरी यह खुशहाल जिंदगी अच्छी नहीं लगी। शादी के दो साल बाद ही एक जीप हादसे में मेरी दुनिया उजड़ गई। पति के साथ जीवन का छोटा सा अरसा गुजरा और फिर उनकी मौत के बाद घोर हताशा के वे क्षण, जब बार-बार खुदकुशी कर लेने का विचार मन में आता था।’’

जिस वक्त मामोनी की जिंदगी में यह तूफान आया उस वक्त वह तेईस साल की थीं। ‘‘उसके बाद मैं वृंदावन आ गई। आफ्टर डेथ माई हस्बेंड मैं लिखने-पढ़ने में समय बिताने लगी। एक साल तो मैंने ग्वालपाड़ा सैनिक स्कूल में काम किया। उसके बाद गवर्नर ऑफ असम के स्कॉलरशिप पर वृंदावन में माधव कंदली के ‘असमिया रामायण’ और ‘गोस्वामी तुलसीदास’ के रामचरित मानस का तुलनात्मक अध्ययन किया। दोनों का मेटाफर इतना पसंद आया कि मैंने सोच लिया कि इसी पर काम करूंगी। लेकिन जब मैं वृंदावन आई तो वहां कृष्णदासियों और पंडे-पुजारियों की जीवन झांकियां मन में क्षोभ और वितृष्णा पैदा करते थे।’’

सन 1971 में मामोनी दिल्ली आ गईं और दिल्ली विवि में मॉडर्न इंडियन लैंग्वेजेज डिपार्टमंेट में अध्यापन करने लगीं। दिल्ली में रहते हुए मामोनी को दुनिया ने इंदिरा गोस्वामी के नाम से जाना लेकिन उनके करीबी आज भी उन्हें मामानी कहकर ही संबोधित करते हैं।

मार्च 2003 में दिल्ली युनिवर्सिटी के प्रोफेसर कालोनी के फ्लैट में दिल्ली पढ़ने आई असमी बालाओं से घिरी मामोनी ने एक मुलाकात में बताया, ‘‘सन 71 से  दिल्ली में अकेली रह रही हूं। एक मकान मे अकेले रहना३पहले शक्ति ननगर में रहती थी फिर यहां प्रोफेसर कालोनी आ गई। लेकिन ब्रह्मपुत्र को लेकर आज भी मेरे अंदर ग्रेट फीलिंग है।’’

सन 2008 में वह रिटायर हो गईं लेकिन पढ़ने-लिखने का जुनून कम न हुआ। लेकिन खबर है कि पछले दिनों जब वह अचानक कॉमा में चली गई तो उन्हें गुवाहाटी शिफ्ट कराया गया। ब्रह्मपुत्र  के किनारे ही एक अस्पताल में आज उनका इलाज चल रहा है।

सोमवार, 22 अगस्त 2011

मैं अण्णा नहीं बनना चाहूंगी : अरुंधति राय


 अरुंधति राय
मित्रो,
अण्णा  हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के तौर- तरीके को लेकर अरुंधति राय ने 'द हिन्दू'  (21 अगस्त 2011) में एक लेख लिखा है. हिन्दी के पाठकों के लिए पेश है भाई मनोज पटेल का अनुवाद उनके ब्लॉग 'पढ़ते-पढ़ते' से साभार. 
- शशिकांत 


अण्णा के तौर-तरीके भले ही गांधीवादी हों मगर उनकी मांगें निश्चित रूप से गांधीवादी नहीं हैं.

जो कुछ भी हम टी.वी. पर देख रहे हैं अगर वह सचमुच क्रांति है तो हाल फिलहाल यह सबसे शर्मनाक और समझ में न आने वाली क्रांति होगी. इस समय जन लोकपाल बिल के बारे में आपके जो भी सवाल हों उम्मीद है कि आपको ये जवाब मिलेंग : किसी एक पर निशान लगा लीजिए - (1.) वन्दे मातरम, (2.) भारत माता की जय, (3.) इंडिया इज अन्नाअन्ना इज इंडिया, (4.) जय हिंद.  

आप यह कह सकते हैं किबिलकुल अलग वजहों से और बिलकुल अलग तरीके सेमाओवादियों और जन लोकपाल बिल में एक बात सामान्य है. वे दोनों ही भारतीय राज्य को उखाड़ फेंकना चाहते हैं. एक नीचे से ऊपर की ओर काम करते हुएमुख्यतया सबसे गरीब लोगों से गठित आदिवासी सेना द्वारा छेड़े गए सशस्त्र संघर्ष के जरिएतो दूसरा ऊपर से नीचे की तरफ काम करते हुए ताजा-ताजा गढ़े गए एक संत के नेतृत्व मेंअहिंसक गांधीवादी तरीके से जिसकी सेना में मुख्यतया शहरी और निश्चित रूप से बेहतर ज़िंदगी जी रहे लोग शामिल हैं. (इस दूसरे वाले में सरकार भी खुद को उखाड़ फेंके जाने के लिए हर संभव सहयोग करती है.)

अप्रैल 2011 में, अण्णा हजारे के पहले "आमरण अनशन" के कुछ दिनों बाद भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े घोटालों सेजिसने सरकार की साख को चूर-चूर कर दिया थाजनता का ध्यान हटाने के लिए सरकार ने टीम अण्णा को ("सिविल सोसायटी" ग्रुप ने यही ब्रांड नाम चुना है) नए भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून की ड्राफ्टिंग कमेटी में शामिल होने का न्योता दिया. कुछ महीनों बाद ही इस कोशिश को धता बताते हुए उसने अपना खुद का विधेयक संसद में पेश कर दिया जिसमें इतनी कमियाँ थीं कि उसे गंभीरता से लिया ही नहीं जा सकता था. 

फिर अपने दूसरे "आमरण अनशन" के लिए तय तारीख 16 अगस्त की सुबहअनशन शुरू करने या किसी भी तरह का अपराध करने के पहले ही अन्ना हजारे को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया. जन लोकपाल बिल के लिए किया जाने वाला संघर्ष अब विरोध करने के अधिकार के लिए संघर्ष और खुद लोकतंत्र के लिए संघर्ष से जुड़ गया. 

इस 'आजादी की दूसरी लड़ाईके कुछ ही घंटों के भीतर अण्णा को रिहा कर दिया गया. उन्होंने होशियारी से जेल छोड़ने से इन्कार कर दियाबतौर एक सम्मानित मेहमान तिहाड़ जेल में बने रहे और किसी सार्वजनिक स्थान पर अनशन करने के अधिकार की मांग करते हुए वहीं पर अपना अनशन शुरू कर दिया. तीन दिनों तक जबकि तमाम लोग और टी.वी. चैनलों की वैन बाहर जमी हुई थींटीम अण्णा के सदस्य उच्च सुरक्षा वाली इस जेल में अन्दर-बाहर डोलते रहे और देश भर के टी.वी. चैनलों पर दिखाए जाने के लिए उनके वीडियो सन्देश लेकर आते रहे. (यह सुविधा क्या किसी और को मिल सकती है?) 

इस बीच दिल्ली नगर निगम के 250 कर्मचारी, 15 ट्रक और जे सी बी मशीनें कीचड़ युक्त रामलीला मैदान को सप्ताहांत के बड़े तमाशे के लिए तैयार करने में दिन रात लगे रहे. अब कीर्तन करती भीड़ और क्रेन पर लगे कैमरों के सामनेभारत के सबसे महंगे डाक्टरों की देख रेख मेंबहुप्रतीक्षित अन्ना के आमरण अनशन का तीसरा दौर शुरू हो चुका है. टी.वी. उद्घोषकों ने हमें बताया कि "कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है."    

अण्णा हजारे के तौर-तरीके गांधीवादी हो सकते हैं मगर उनकी मांगें कतई गांधीवादी नहीं हैं. सत्ता के विकेंद्रीकरण के गांधी जी के विचारों के विपरीत जन लोकपाल बिल एक कठोर भ्रष्टाचार निरोधी क़ानून है जिसमें सावधानीपूर्वक चुने गए लोगों का एक दल हजारों कर्मचारियों वाली एक बहुत बड़ी नौकरशाही के माध्यम से प्रधानमंत्रीन्यायपालिकासंसद सदस्यऔर सबसे निचले सरकारी अधिकारी तक यानी पूरी नौकरशाही पर नियंत्रण रखेगा. लोकपाल को जांच करनेनिगरानी करने और अभियोजन की शक्तियां प्राप्त होंगी. इस तथ्य के अतिरिक्त कि उसके पास खुद की जेलें नहीं होंगी यह एक स्वतंत्र निजाम की तरह कार्य करेगाउस मुटाएगैरजिम्मेदार और भ्रष्ट निजाम के जवाब में जो हमारे पास पहले से ही है. एक की बजाएबहुत थोड़े से लोगों द्वारा शासित दो व्यवस्थाएं.   

यह काम करेगी या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कि भ्रष्टाचार के प्रति हमारा दृष्टिकोण क्या हैक्या भ्रष्टाचार सिर्फ एक कानूनी सवालवित्तीय अनियमितता या घूसखोरी का मामला है या एक बेहद असमान समाज में सामाजिक लेन-देन की व्यापकता है जिसमें सत्ता थोड़े से लोगों के हाथों में संकेंद्रित रहती है

मसलन शापिंग मालों के एक शहर की कल्पना करिए जिसकी सड़कों पर फेरी लगाकर सामान बेचना प्रतिबंधित हो. एक फेरी वालीहल्के के गश्ती सिपाही और नगर पालिका वाले को एक छोटी सी रकम घूस में देती है ताकि वह क़ानून के खिलाफ उन लोगों को अपने सामान बेंच सके जिनकी हैसियत शापिंग मालों में खरीददारी करने की नहीं है. क्या यह बहुत बड़ी बात होगीक्या भविष्य में उसे लोकपाल के प्रतिनिधियों को भी कुछ देना पड़ेगाआम लोगों की समस्याओं के समाधान का रास्ता ढांचागत असमानता को दूर करने में है या एक और सत्ता केंद्र खड़ा कर देने में जिसके सामने लोगों को झुकना पड़े. 

अण्णा की क्रान्ति का मंच और नाचआक्रामक राष्ट्रवाद और झंडे लहराना सबकुछ आरक्षण विरोधी प्रदर्शनोंविश्व कप जीत के जुलूसों और परमाणु परीक्षण के जश्नों से उधार लिया हुआ है. वे हमें इशारा करते हैं कि अगर हमने अनशन का समर्थन नहीं किया तो हम 'सच्चे भारतीयनहीं हैं. चौबीसों घंटे चलने वाले चैनलों ने तय कर लिया है कि देश भर में और कोई खबर दिखाए जाने लायक नहीं है. 

यहाँ अनशन का मतलब मणिपुर की सेना को केवल शक की बिना पर हत्या करने का अधिकार देने वाले क़ानून AFSPA के खिलाफ इरोम शर्मिला के अनशन से नहीं है जो दस साल तक चलता रहा (उन्हें अब जबरन भोजन दिया जा रहा है). अनशन का मतलब कोडनकुलम के दस हजार ग्रामीणों द्वारा परमाणु बिजली घर के खिलाफ किए जा रहे क्रमिक अनशन से भी नहीं है जो इस समय भी जारी है.

'जनताका मतलब मणिपुर की जनता से नहीं है जो इरोम के अनशन का समर्थन करती है. वे हजारों लोग भी इसमें शामिल नहीं हैं जो जगतसिंहपुर या कलिंगनगर या नियमगिरि या बस्तर या जैतपुर में हथियारबंद पुलिसवालों और खनन माफियाओं से मुकाबला कर रहे हैं. 'जनतासे हमारा मतलब भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों और नर्मदा घाटी के बांधों के विस्थापितों से भी नहीं होता. अपनी जमीन के अधिग्रहण का प्रतिरोध कर रहे नोयडा या पुणे या हरियाणा या देश में कहीं के भी किसान 'जनतानहीं हैं.     

'जनताका मतलब सिर्फ उन दर्शकों से है जो 74 साल के उस बुजुर्गवार का तमाशा देखने जुटी हुई है जो धमकी दे रहे हैं कि वे भूखे मर जाएंगे यदि उनका जन लोकपाल बिल संसद में पेश करके पास नहीं किया जाता. वे दसियों हजार लोग 'जनताहैं जिन्हें हमारे टी.वी. चैनलों ने करिश्माई ढंग से लाखों में गुणित कर दिया हैठीक वैसे ही जैसे ईसा मसीह ने भूखों को भोजन कराने के लिए मछलियों और रोटी को कई गुना कर दिया था. "एक अरब लोगों की आवाज़" हमें बताया गया. "इंडिया इज अन्ना." 

वह सचमुच कौन हैंयह नए संतजनता की यह आवाज़आश्चर्यजनक रूप से हमने उन्हें जरूरी मुद्दों पर कुछ भी बोलते हुए नहीं सुना है. अपने पड़ोस में किसानों की आत्महत्याओं के मामले पर या थोड़ा दूर आपरेशन ग्रीन हंट परसिंगूरनंदीग्रामलालगढ़ परपास्कोकिसानों के आन्दोलन या सेज के अभिशाप परइनमें से किसी भी मुद्दे पर उन्होंने कुछ भी नहीं कहा है. शायद मध्य भारत के वनों में सेना उतारने की सरकार की योजना पर भी वे कोई राय नहीं रखते. 

हालांकि वे राज ठाकरे के मराठी माणूस गैर-प्रान्तवासी द्वेष का समर्थन करते हैं और वे गुजरात के मुख्यमंत्री के विकास माडल की तारीफ़ भी कर चुके हैं जिन्होनें 2002 में मुस्लिमों की सामूहिक हत्याओं का इंतजाम किया था. (अण्णा ने लोगों के कड़े विरोध के बाद अपना वह बयान वापस ले लिया था मगर संभवतः अपनी वह सराहना नहीं.)

इतने हंगामे के बावजूद गंभीर पत्रकारों ने वह काम किया है जो पत्रकार किया करते हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ अण्णा के पुराने रिश्तों की स्याह कहानी के बारे में अब हम जानते हैं. अण्णा के ग्राम समाज रालेगान सिद्धि का अध्ययन करने वाले मुकुल शर्मा से हमने सुना है कि पिछले 25 सालों से वहां ग्राम पंचायत या सहकारी समिति के चुनाव नहीं हुए हैं. 

'हरिजनोंके प्रति अण्णा के रुख को हम जानते हैं: "महात्मा गांधी का विचार था कि हर गाँव में एक चमारएक सुनारएक लुहार होने चाहिए और इसी तरह से और लोग भी. उन सभी को अपना काम अपनी भूमिका और अपने पेशे के हिसाब से करना चाहिएइस तरह से हर गाँव आत्म-निर्भर हो जाएगा. रालेगान सिद्धि में हम यही तरीका आजमा रहे हैं." क्या यह आश्चर्यजनक है कि टीम अण्णा के सदस्य आरक्षण विरोधी (और योग्यता समर्थक) आन्दोलन यूथ फार इक्वेलिटी से भी जुड़े रहे हैं

इस अभियान की बागडोर उन लोगों के हाथ में है जो ऐसे भारी आर्थिक अनुदान पाने वाले गैर सरकारी संगठनों को चलाते हैं जिनके दानदाताओं में कोका कोला और लेहमन ब्रदर्स भी शामिल हैं. टीम अण्णा के मुख्य सदस्यों में से अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसोदिया द्वारा चलाए जाने वाले कबीर को पिछले तीन सालों में फोर्ड फाउंडेशन से 400000 डालर मिल चुके हैं. 

इंडिया अगेंस्ट करप्शन अभियान के अंशदाताओं में ऎसी भारतीय कम्पनियां और संस्थान शामिल हैं जिनके पास अल्युमिनियम कारखाने हैंजो बंदरगाह और सेज बनाते हैंजिनके पास भू-संपदा के कारोबार हैं और जो करोड़ों करोड़ रूपए के वित्तीय साम्राज्य वाले राजनीतिकों से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध हैं. उनमें से कुछ के खिलाफ भ्रष्टाचार एवं अन्य अपराधों की जांच भी चल रही है. आखिर वे इतने उत्साह में क्यों हैं?   

याद रखिए कि विकीलीक्स द्वारा किए गए शर्मनाक खुलासों और एक के बाद दूसरे घोटालों के उजागर होने के समय ही जन लोकपाल बिल के अभियान ने भी जोर पकड़ा. इन घोटालों में जी स्पेक्ट्रम घोटाला भी था जिसमें बड़े कारपोरेशनोंवरिष्ठ पत्रकारोंसरकार के मंत्रियों और कांग्रेस तथा भाजपा के नेताओं ने तमाम तरीके से साठ-गाँठ करके सरकारी खजाने का हजारों करोड़ रूपया चूस लिया. सालों बाद पहली बार पत्रकार और लाबीइंग करने वाले कलंकित हुए और ऐसा लगा कि कारपोरेट इंडिया के कुछ प्रमुख नायक जेल के सींखचों के पीछे होंगे. जनता के भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन के लिए बिल्कुल सटीक समय. मगर क्या सचमुच?

ऐसे समय में जब राज्य अपने परम्परागत कर्तव्यों से पीछे हटता जा रहा है और निगम और गैर सरकारी संगठन सरकार के क्रियाकलापों को अपने हाथ में ले रहे हैं (जल एवं विद्युत् आपूर्तिपरिवहनदूरसंचारखननस्वास्थ्यशिक्षा)ऐसे समय में जब कारपोरेट के स्वामित्व वाली मीडिया की डरावनी ताकत और पहुँच लोगों की कल्पना शक्ति को नियंत्रित करने की कोशिश में लगी हैकिसी को सोचना चाहिए कि ये संस्थान भी -- निगममीडिया और गैर सरकारी संगठन -- लोकपाल के अधिकार-क्षेत्र में शामिल किए जाने चाहिए. इसकी बजाए प्रस्तावित विधेयक उन्हें पूरी तरह से छोड़ देता है.     

अब औरों से ज्यादा तेज चिल्लाने सेऐसे अभियान को चलाने से जिसके निशाने पर सिर्फ दुष्ट नेता और सरकारी भ्रष्टाचार ही होबड़ी चालाकी से उन्होंने खुद को फंदे से निकाल लिया है. इससे भी बदतर यह कि केवल सरकार को राक्षस बताकर उन्होंने अपने लिए एक सिंहासन का निर्माण कर लिया हैजिसपर बैठकर वे सार्वजनिक क्षेत्र से राज्य के और पीछे हटने और दूसरे दौर के सुधारों को लागू करने की मांग कर सकते हैं -- और अधिक निजीकरणआधारभूत संरचना और भारत के प्राकृतिक संसाधनों तक और अधिक पहुँच. ज्यादा समय नहीं लगेगा जब कारपोरेट भ्रष्टाचार को कानूनी दर्जा देकर उसका नाम लाबीइंग शुल्क कर दिया जाएगा. 

क्या ऎसी नीतियों को मजबूत करने से जो उन्हें गरीब बनाती जा रही है और इस देश को गृह युद्ध की तरफ धकेल रही है, 20 रूपए प्रतिदिन पर गुजर कर रहे तिरासी करोड़ लोगों का वाकई कोई भला होगा

यह डरावना संकट भारत के प्रतिनिधिक लोकतंत्र के पूरी तरह से असफल होने की वजह से पैदा हुआ है. इसमें विधायिका का गठन अपराधियों और धनाढ्य राजनीतिकों से हो रहा है जो जनता की नुमाइन्दगी करना बंद कर चुके हैं. इसमें एक भी ऐसा लोकतांत्रिक संस्थान नहीं है जो आम जनता के लिए सुगम हो. झंडे लहराए जाने से बेवकूफ मत बनिए. हम भारत को आधिपत्य के लिए एक ऐसे युद्ध में बंटते देख रहे हैं जो उतना ही घातक है जितना अफगानिस्तान के युद्ध नेताओं में छिड़ने वाली कोई जंग. बस यहाँ दांव पर बहुत कुछ हैबहुत कुछ.